Monday, 20 January 2025

हृदय समंदर बन मेरा

हृदय समंदर बन मेरा 
हर ग़म को समाये बैठा है 
बस्ती बस्ती सहरां सहरां 
खुद को लुटाये बैठा है 
इक आवाज़ की जिद है 
कि वो बाहर आएगी 
सब्र भरा पर दिल ये मेरा 
उसको दबाए बैठा है 
लहर लहर पर उसकी रौनक 
पल भर ही तो होती है 
हुजूम लेकिन उसी झाग को 
अपना दिल दे बैठा है 
चश्मे नम की दो बूंदें 
सागर को नमकीन कर देती है 
वक्ती तपिश से सारा जंगल 
देखो झुलसा बैठा है
एक अकेला मैं और 
मेरी रंजिश की वो यादें हैं 
नहीं मिटने वाली है फिर भी 
जबरन झुठला बैठा है 
'रवि' कभी तो उम्मीदों को 
ज़रा मुकर्रर होने दे 
जिन्हें भुलाना चाहा जब तब 
उनसे लिपट कर बैठा है 
कवि 'रवि' 

एक शेर

लोग अक्सर के मेरा रिंदाना याद रखते हैं 
चोटों में लगी वो आग मगर भूल जाते हैं 
दिले आशना ये कैसी कश्मकश है 
दरे मयकदे पे तुझको ज़ख्म याद आते है

Friday, 17 January 2025

जिंदगी जीने का फलसफा

जिंदगी जीने का फलसफा मेरा 
तुम क्या जानो 
कैसा दिखता हूं, हर सुबह 
आइने से पूछ लेता हूं 
आंख मूंद कर हर रात 
सोने से पहले 
कैसे पेश आया हूं दिन भर 
अंतर्मन से पूछ लेता हूं 
रात कैसे बीती 
मेरे बिस्तर की सिलवटें 
उठते ही समझा देती है 
ख्वाबों में ख्याल या फिर ख्याली ख्वाब 
जो भी पेशतर होता है 
उसे वक्त का बर्ताव मान लेता हूं 
'रवि' इस अलम दुनिया में 
एक तू ही है अलाहिदा किरदार 
बीतने वाले हर पल को 
अपना कलमगार जान लेता हूं 
कवि 'रवि'

Sunday, 5 January 2025

ध्यानीमनी चित्ती

ध्यानीमनी चित्ती 
सदा राम पाही 
तयासी सुखाची 
कदा भ्रांत नाही 
असे नाम ज्याच्या 
श्वासात लिप्त 
तयासी पडेना 
कशाची ददात 
राम एक दाता 
राम ची हो त्राता 
राम सेवकांचा 
सदा ज्येष्ठ भ्राता 
मुखी राम येता 
शत्रु होई नि:शेष 
तशी रामरक्षा 
असे हो विशेष 
अशा रामराया 
सदा आठवावे 
नित्य कार्यारंभी 
सदा ते वदावे 
श्रीराम जयराम जय जय राम 
श्रीराम जयराम जय जय राम 
कवि 'रवि'

Thursday, 2 January 2025

उम्र का तकाजा और मैं

उम्र के तकाजे ने 'रवि' 
जिस्म को अधमरा कर दिया 

मन बन उड़ता पंछी मगर 
जाने कहां कहां चल दिया 

वो वो न रहे हम हम ना रहे 

वक्त के धुंधलके ने 
नामोनिशान बदल दिया 

एक आह भी उनकी तभी 
आफते जां हुआ करती थी 

आबोहवा ने इस दौर के 
सारा जहां बदल दिया 

क्या ख़ाक में अब चैन से 
जीना सलीकेदार होगा 

कब्रगाहों को किसी ने 
शोरगुल से भर दिया 

रस्मों रिवाजों को निभाने 
वक्त ही बाकी नहीं 

मय्यते इंसां को कंधा 
चार पहियों ने दिया

चार लम्हे इशरतों के 
क्यों भुलाये ना भुले 

याददारी ने क्यों मुझे 
इतना निकम्मा कर दिया 

कवि 'रवि'