Tuesday, 22 October 2024

मद्यशाला

सांजवेळ जेंव्हा मद्याच्या प्याल्यात उतरून येते 
मद्यप्यांना तेंव्हा चहूकडे साकीच दृष्टीस येते 
महफिलीचा कैफ असा बदनाम कां आहे 
प्रत्येकाला एकदा चाखून बघण्याची हौस येते 
मद्यगृहाची वाट तितकी सरळ नसतेच कधी मित्रांनो 
दु:ख-भावनांचं युद्ध होते तेंव्हा ती दिसून येते 
हृदयाच्या जखमांवर औषध बनते साकी ची दृष्टी 
एक आंतरिक समाधान उगवते जेंव्हा ती येते 
आज जरी वेळ इतकी रुष्ट झालीय तुझ्या वर 'रवि'
यातून पार झाल्यावरच पुढे सुखाची वेळ येते 
कवि 'रवि'

खुसूसियत ए मैक़दा

शाम जब मय के प्याले में उतर आती है 
हर तरफ साकी ही रिंदों को नज़र आती है 
रंगे महफ़िल इस क़दर बदनाम क्यों है 
हर शख्स को तजुर्बे की चाहत उभर ही आती है 
राहे मैकदा नहीं होती है कभी आसान यारों 
दर्द जज़्बात से टकराते हैं तब वो आती है 
दिल की चोटों पे दवा बनती है साकी की नज़र 
सुकूं की लहर दौड़ जाती है जब वो आती है 
आज गर इतना खफा है समां तुझपे 'रवि'
याद रख के इश़रत की घड़ी भी आती है 
कवि 'रवि'

Monday, 21 October 2024

हात हाती घेतला होता....

हात हाती घेतला होता 
तिचा मी ज्याक्षणी 
विश्व माझे ते न उरले 
लुप्त झाले त्या क्षणी 
ती तशी दिवसा प्रखर अन् 
रात्री शीतल होतसे 
मीच मजला प्राप्ती मानून 
धुंद होई त्या क्षणी 
जीवची तो गुंतला 
जव भ्रमर पंथे लागला 
एकदुजां आनंद द्यावा 
छंद बनला त्या क्षणी 
कां मनाला बोध द्यावा 
धीर धरण्या साठीचा 
प्रेम देवाचीच करणी
तोही फसला त्या क्षणी 
सृष्टी सारी जीव सारे 
सृजनास की हो बद्ध आहे 
मी ही पामर त्यातला 
कैसे चुकावे त्या क्षणी 
करुनिया दशकांची संगत 
ती न उरली वेगळी 
मी न उरलो स्वत्व नुरले 
एकत्व उरले त्या क्षणी 
गत स्मृतींना जागवाया 
वृद्धत्व आहे वेळ आहे 
चल 'रवि' स्वप्नात रमण्या 
तिच्या सवे मग ह्या क्षणी 
कवि 'रवि' 

Saturday, 19 October 2024

दिल दिमाग और कश्मकश

Thursday, 17 October 2024

मैं और वो

उसे आना होगा 
तो आएगा 
इंतिजा़र क्यों करूं 
मैं जानता हूं 
वो है मददगार 
तकरार क्यों करूं 
मंदिर की दहलीज तक 
वो ही तो लाता है मुझे 
दुआ में उठा भी देता है
मेरे हाथ 
इसरार क्यों करूं 
जिंदगी का माइना 
आसान लगता है 
बिन मांगे देता है वो 
इज़हार क्यों करूं 
सांसों की लकीरें 
जब पिरोई है उसी ने 
'रवि' और ज्यादा कुछ मांग कर 
उसे शर्मसार क्यों करूं 
कवि 'रवि' 

जद्दोजहद

सुबह होते ही चर्चा ये आम होती है 
के रात की जिंदगी तमाम होती है 
सूरज ढलते ही जब फिर से शाम होती है 
ख्वाहिशें मुल्तवी फिर सहर के नाम होती है 
मेरा मशविरा उसने कभी लिया न लिया 
जद्दोजहद की इन्तेहा मेरे नाम होती है 
एक अदद से तन्हाई को समेटे बैठा है 
महफ़िल में 'रवि' देख तेरी शायरी आम होती है 
कवि 'रवि'

Tuesday, 15 October 2024

गर तू मेरा दोस्त है तो

Saturday, 5 October 2024

वाह ये जिंदगी

 हाथों की लकीरों से भला 
काम कभी चलता है
अधूरे कामों की चिंता के साथ
अपना दिन निकलता है
हाथ धोकर देख लिया
फिर भी
एक बार यह सोचकर
हो ना हो कोई तिनका खुशकिस्मती का
किसी कोने में लकीर के
क्या सचमुच मिलता है
भूत-वर्तमान और भविष्य
घटनाओं का महज़ एक सिलसिला है
रोने के सिवाय जन्म के साथ
कभी कुछ और नहीं मिलता है
जिनके भरोसे जन्म लिया
वे भी तो हो जाते है फ़ना 
जेहन को सांस का साथ
कहां बदस्तूर मिलता है
तेरी हस्ती की लिखावट 'रवि' दर असल
तेरे हाथों में थी
लकीरों के भरोसे भला
किसी का काम कभी चलता है
कवि 'रवि'

Wednesday, 2 October 2024

बेसब्र की इंतहा

 

वो गलतियां सरासर करते गए 

हम और भी सब्रसार होते गए 

खता फिर भी हम पर ही लादी गई 

वो जब भी जज्बों को खोते गए

तबस्सुम अधर पर आती रही 

निगाहों से कत़ल वो यूं करते गए 

आगाज़ ए मुहब्बत जताती रहीं 

नावाकिफ अंजाम तक जाते गए

'रवि' एक लम्हे की ख्वाहिश रही 

पुरी उम्र हमपर उड़ाते गए

कवि 'रवि'