Saturday, 28 December 2024

चंद ख्वाब एक हकीकत

मैं ख्वाब में सितारों की सैर नहीं करता 
किसी रुख्साना के दहलीज का दरख्त नहीं बनता 
अपने आगोश में सिमट रखें हैं ज़माने के ग़म 
कराहती है भी कभी किस्मत 
पर मैं उफ़ तक नहीं करता 
ऐ शोख अदाओं वाली तेरी उम्र भी क्या है 
एक पल के वास्ते भी तुझे 
पनाहगार नहीं मिलता 
मैं वो हूं जिसे तारीख ने गोद ले रखा है 
तुझे तारीफ के सिवा जमाने से कुछ नहीं मिलता 
कवि 'रवि'

Monday, 23 December 2024

कमाल ए यार

कमाल ए यार आज कुछ इस क़दर हुआ 
ना चाहते हुए भी दिल में गदर हुआ 
वो मिला मुझे मयकदे की दहलीज पर 
क्यों शेख पर यारों इतना असर हुआ 
वो दोस्त है मेरा सारा जहां वाकिफ हैं 
गौरतलब ये बदलाव किस क़दर हुआ 
दूर से देखा किये उसको तसल्ली थी 
एक हमदर्द है जानकर जीना बसर हुआ 
या खुदा एहसास की इंतेहा आज हुई 
ये मंज़र मेरे ही नसीब क्योंकर हुआ 
मैं रिंद मैख्वार किससे कहूं चाहतों का सिला 
सोचा किया 'रवि' तो जीना दुश्वार हुआ 
कवि 'रवि' 

Sunday, 22 December 2024

आकाश कल्पनांचे

सामर्थ्य हे तमा चे की बुद्धी दोष आहे 
भ्रम हा कसा कळे ना ह्याचाच रोष आहे 
उठता उधाण लाटा धीरस्त तो किनारा 
जरि कां मनात त्याच्या चिंतेस वाट आहे 
असले जरी असे तो करी सामना तयाचा 
तव थोर जलधि तो ओहोटीस जात आहे 
मनातील वादळाला का दिशा ठरवून देतोसी
तुझ्या नादानतेने ते विरोनी जात मग आहे 
जमाना आज जो दिसतो उद्याला लोप तो होतो 
अकर्मण्यातुनी तुझिया क्रांतिचा ऱ्हास रे आहे 
जयाने जन्म हा दिधला तयाला अर्पुनी द्यावा 
वृथा अभिमान तुजला हा छळतोचि बघ आहे 
दिसतात रोज मरणे जरि कां क्षणाक्षणाला 
तरी श्वास हा मजला असा चिकटोनि कां आहे 
उधळून जाऊ दे रे अश्वास त्या मनाच्या 
आकाश कल्पनांचे तव स्वागतास आहे 
आकाश कल्पनांचे...........
                         ..,.........तव स्वागतास आहे
कवि 'रवि' 

Friday, 20 December 2024

चंद अशयारों में

चंद अशयारों में जिंदगी 
सिमट कर रह गई यारों 
जो कहानी जुबां कह न सकी 
कलम कह गई यारों 
नाकामयाबी को गले लगा कर 
चूप रहते थे मगर 
दर्दे आशनाई को 
दुनिया समझ गई यारों 
अफसाना उल्फत कभी 
रंगीन रहा होगा शायद 
दिल की चोटें ही मेरी 
दवा बन गई यारों 
है आसमां वाला तो 
कभी तजुर्बा करा दें मुझे 
आबाद हकीकतें तखल्लुस में 
जब्त पड़ गई यारों 
बेगैरत है ज़माना तो इल्ज़ाम किसको दें 
'रवि' की नज़्म भी 
'कालीख ए शब' में खो गई यारों 
कवि 'रवि'

Tuesday, 10 December 2024

आयुष्याच्या उतरंडीला

आयुष्याच्या उतरंडीला 
तत्पर रहावे कोणत्याही प्रसंगाला 
मिटवा मी पणा जो अंगी आला 
प्रपंचा कारणें 
आता एकची चिंतन 
मन व्हावे निर्मळ, वृत्ति सज्जन 
कधी असो नये भयासी कारण 
वर्तन अपुले 
संतांच्या ठायी सदा चित्त 
घडू नये क्रोध, कृती उन्मत्त 
अंतिम लक्ष्य व्हावा मोक्ष प्राप्त 
योनिचक्र स्थिरावया 
'रवि' म्हणे भागवत धर्म 
निष्काम असावे कर्म 
हेंचि असे हो मर्म 
मनुष्य जन्माचे 
आला आला यमदूत 
जिव्हें बोलावा अवधूत 
टाकुनिया मृत्यूची भ्रांत 
मार्ग क्रमण करावा 
ॐ विष्णवे नमः 
ॐ नमः शिवाय 
शांति: शांति: शांति:
कवि 'रवि'

Tuesday, 3 December 2024

सिलसिला ए सोज़

अब क्योंकर नागवार हुआ 
सिलसिला ए सोज 
ये वो शय है जो जगाती है रातों को तो
रोज़ ब रोज़
एक तूफान जो झिंझोड़े मुझे 
वक्त बे वक्त ऐ दोस्त 
इंतिजा़र क्यों इस कदर 
उसका होता है मुझे रोज़ 
आरजुओं का अंबार लिए 
आता है वो जब नज़र 
डरता हूं कहीं धड़कन उसकी 
न दब जाए किसी रोज़ 
वो दर्द जो मिलता है कांटों से 
गुलों के साथ 
ऐसे जख्मों को अलबत्ता 
छुपाता हूं रोज़ रोज़ 
एक अफसाना है लिखा जा रहा 
अजल से 'रवि'
मिटता बनता है हर किरदार 
उसके कलम से रोज़ रोज़ 
कवि 'रवि' 

सिलसिला ए सोज़