Sunday, 28 December 2025

दश्तों के साये में

दश्तों के साये में खो भी जाऊं गर कभी 
मेरी आवाज़ पर तुम मगर नाज़ करना 
दस्तूर मुहब्बत का उम्रे रफ्ता से बेदखल 
चंद सदियों तलक मुझे याद करना 
बेहतर होगा कि रहे दुनियादारी से दूर 
दिल्लगी में मसरूफ झूठी रस्मों से दूर 
किस्सा ए मुहब्बत अपने नाम भी हो लें 
नायाब तरकीब कोई ईजाद करना 
नाज़ ए मुहब्बत है कुद़रतन मिजाज 'रवि'
इन्हीं आदतों को तामील करना 
कवि 'रवि' 

Friday, 26 December 2025

एक अर्ज है

Thursday, 25 December 2025

मेरी चाहत मेरी नज़र

भला और दुनिया से क्या चाहता हूं
बची उम्र को बस सुकूं चाहता हूं
अशयार मेरे ना हों भी पुरस्सर
लबों पर तुम्हारे दुआ चाहता हूं
रहूं रात-भर मंजिलों के सफर में
ख्वाबों खयालों की लंबी डगर में
हुआ रूबरू तो रहें ऐतबार
इनायत की इतनी नज़र चाहता हूं
उलझ कर रहा तालीमों के कफस़ में
लिए दर्द जीने की बेजा हवस में
'रवि' अलविदा होगी आलम से जब रूह
दुआ में तुम्हारे असर चाहता हूं
कवि 'रवि'

Wednesday, 24 December 2025

बेरुखी ही सही

बेरुखी ही सही मुझे पहचान तो लिया 
मुज़ाकरात लफ़्ज़ों से ना हो ना सही
मगर चश्मों ने चश्मों से बदस्तूर किया 
सिलसिला ए इश्क अजल से रुका था 
बिना कुछ कहे ही आबाद हुआ 
दिल की दिल से गूफ्तगू एक अजाब सा है 
इशारा किसी क़दर किया ना किया 
वो ज़ख्म उनसे जो हासिल हुए थे कभी 
फहम शातिर इतना के कभी भरने ना दिया 
ये आखरी इल्तेजा है के आओ ना फिर कभी 
'रवि' उनकी हरकतों ने जीने ना दिया, मरने ना दिया 
कवि 'रवि' 

Sunday, 21 December 2025

दोस्त हैं पर कभी तकदीर बन आता है वो

ज़माने भर की तकरीरें बुन ले आता है वो 
कोई नसीहत, कभी फर्मान दे जाता है वो 
ये मेरा दिल ही ऐसा है सभी को साध लेता है 
कद्र उसकी नज़र अंदाज़ कर जाता है वो 
मेरी तस्वीर मुझे चंद खामियां दिखाती है 
मेरे मूंह पर मेरी तारीफ कर जाता है वो 
मेरा उसका कभी मिलना यूं तो एक हादसा सा था 
मगर अब लम्हे लम्हे की खबर रख जाता है वो 
परेशां देखता मुझको कभी तो ढांढस बंधाता है 
मेरे एवज के आंसू भी बहा जाता है वो 
करिश्मा है उसे हर फन का हुनर हासिल है 
संग नुमा मुझमें कोई बुत की तलाश कर जाता है वो 
कवि 'रवि' 

Thursday, 18 December 2025

बेसब्र मुहब्बत

वो बेसब्र इतने की जागते हुए ही ख्वाब देखते हैं 
हमारी चुप्पी में ही उनके मुताबिक जवाब देखते हैं 
ना इशारा ना गूफ्तगू ना मुजाहिरा ही किया 
ना जाने किस आइने वो इजहार देखते हैं 
अजल से मुकद्दर हमें धोखा ही अता करता रहा 
बेमिसाल है उनके खयालात वो ऐतबार देखते हैं 
मायूसी के अब्र दिले आसमां पे छाए रहते हैं 
'रवि' तुम्हारी पेशानी पर वो ईश्के खुमार देखते हैं 
कवि 'रवि'

Wednesday, 10 December 2025

दिल की दरयाफ़्त

इक आह की पुकार बेजुबान भी महसूस करते हैं

जज्बों की दुहाई देते इंसान मगर मूंह फेर कर जाते हैं

कोई ज़ख्म नामुराद....दिल से लहू बहाता है

रहगुजर पर नाजरीन....मुस्कराहटें याद रखते हैं

वो अहदे उल्फत.......कहीं ताबूत में दफ़नाकर

नये वादों की हरदम........ तस्दीक बजा लातें हैं

करिश्मा ए कुदरत 'रवि'.... हैरतअंगेज इतना

हमारे कुर्निस को वो तोहमत लगा देते हैं

दुवा की इंतहा हो गई मगर चाहतें रुकी नहीं

गुनाह चाहें वो करें...... इल्ज़ाम हमीं पर लाते हैं

कवि 'रवि'

Saturday, 6 December 2025

जज़्बा ए इश्क

नजरें क़ातिल की जब अश्क बहाती है 
बिना औजार के हमारी जान निकाल लेती है 
इश्क जुनून अक्सर ग़म ही बहाल करता है 
बेबस सा मन फिर भी क़ातिल को 
चाहता है 
जज़्बा ए इश्क क्यों इतना संगीन 'रवि'
क़त्ल होता है आशिक पर नाम नहीं लेता है
कवि 'रवि' 

Friday, 5 December 2025

शहर अनजान और दिल नादान




ये शहर अनजान आबोहवा नासाज
सनम की बेवफाई का जरूर है कोर्ई राज
सांसों की आवाजाही महज़ एक आदत रह गई
जमीं पे बिछ गया है जैसे कोई परवाज़
ऐ दिले नादान तेरी हरकतें नागवार
ना कोर्ई कल बचा ना रहा कोई आज
शहर भी धुंधलके में छिपा जा रहा है
तेरी चीखों में नहीं बची है आवाज
दिल की दहलीज पर क्यों खडी करता है तमन्ना
ना कोई आहट कहीं ना कोई गमसाज
कवि 'रवि'

Thursday, 4 December 2025

फित़रत

शाख ने छोड़ा हो चाहे 
गिरने से पहले 
मस्ती में लहराते रहे 
हुनर बहार का अक्सर 
हमीं ठहराते रहे 
याद करें हर दरख़्त 
खूबसूरती हमीं से थी 
सोज़े बहार गुलिस्तां में 
हमीं आजमाते रहे 
चरमरा कर कदमों तले 
मौसिकी निकाल लाते रहे 
ऐ बागबां वाले जाप्ता दर जाप्ता
तेरी चाहत को निभाते रहे 
एक ऐसा भी दौर आएगा 'रवि'
रुख़सत राहे मुक़द्दस पे तुम 
और लोग रोते रहे 
कवि 'रवि' 

Monday, 1 December 2025

अपनी मस्ती में जीने का तरफदार हूं मैं

अपनी मस्ती में जीने का तरफदार हूं मैं 
दुनिया जहां से अलग किरदार हूं मैं 
नावाकिफ है मुझसे ऐसा कोई गमख्वार नहीं 
अलबत्ता उनके खयालों से नाफर्मादार हूं मैं 
देख कर मेरा तकदीर जिन्हें तरस आता है 
उनकी बेखुदी का रूबरू इजहार हूं मैं 
'रवि' अब चल अजल को ये बर्दाश्त नहीं
कह रहा है तेरे हुनर का चश्में यार हूं मैं 
कवि 'रवि'