दश्तों के साये में
दश्तों के साये में खो भी जाऊं गर कभी
दश्तों के साये में खो भी जाऊं गर कभी
भला और दुनिया से क्या चाहता हूं
बेरुखी ही सही मुझे पहचान तो लिया
वो बेसब्र इतने की जागते हुए ही ख्वाब देखते हैं
इक आह की पुकार बेजुबान भी महसूस करते हैं
जज्बों की दुहाई देते इंसान मगर मूंह फेर कर जाते हैं
कोई ज़ख्म नामुराद....दिल से लहू बहाता है
रहगुजर पर नाजरीन....मुस्कराहटें याद रखते हैं
वो अहदे उल्फत.......कहीं ताबूत में दफ़नाकर
नये वादों की हरदम........ तस्दीक बजा लातें हैं
करिश्मा ए कुदरत 'रवि'.... हैरतअंगेज इतना
हमारे कुर्निस को वो तोहमत लगा देते हैं
दुवा की इंतहा हो गई मगर चाहतें रुकी नहीं
गुनाह चाहें वो करें...... इल्ज़ाम हमीं पर लाते हैं
कवि 'रवि'
नजरें क़ातिल की जब अश्क बहाती है