Thursday, 29 June 2023

जय हरी

माह्या माय माऊली ले दंडवत घालतो अन् भौ तुमाले साऱ्याईले जय हरी.
भौ आज देवशयनी एकादशी हाये आन असं
म्हंतात कां आज रोजी पासून देव चार मयने काई मानसा कळे ध्यान देत नाई. तं म्हतलं बावा आपल्याले समजलं तसं तुमाले सांगाव. नाई तं मंग तुमी म्हनसान कां बॉ सांगतलंच नाई. आसू द्या राजे हो, मले मालूम हाये कां तुमाले धर्माचं ज्ञान माह्यावून जास्तच हाये, पन मजाक कऱ्याले काय जाते भौ.
तं सांगाचं आसं कां मी बिन गेल्तो देव दर्शनाले पांडुरंगाच्या पाया पड्याले.गर्दी मंधी मले काई कोनी घूसू देईना भौ. करता करता मंग साऱ्याईच्या मांग आखरी वर मावा नंबर लागला देवा. मंदीरात गेलो तसा पुजारी म्हंते चला चला लवकर दर्शन घ्या आन निंगा भाईर, देवाची निज्याची टाईम झाली. म्या मनात इचार केला कां भौ देव तं चार मैने काई उठतीन न्हाई आन आज त्याईले लोकाईनं लय सतावलं, तवा जरा देवाचे पाय दाबून द्याव. तं मी बसलो देवाच्या पायाजोळ अन् पाय चेपू लागलो. करता करता भौ मले काजून कशी पन तंद्री लागली, पुजारी कवा गेला मले समजलं नाई, पुजाऱ्याले मी दिसलो कसा नाई थे मले काई मालूम पळ्ळं नाई.
तंद्री लागली तशी पायतो तं काय माह्या पाठीवर रखुमाई हात फिरवत मले म्हंते कशी कां लेकरा अरे साऱ्या दिसभर तुले कोनं रांगीत उभं ऱ्हाऊ देल्लं नाई, तुवा कोनाले घोटभर पानी मांगतलं नाई कां एक घास खायाले मांगतलं नाई. पोरा तुया मनात मले अन् पांडुरंगाले कायम बसवून ठिवलं हाये तरी काह्याले रे पोरा इतका आटापिटा केला. 
म्या म्हनलं माय, लोकं सांगत व्हते कां आजपासुन देव जातात निजाले आन मंग चार मैने काई वापस येत नाई. तवा माय मले कायजी लागली कां मावं कसं व्हईन. मले तं माय पायटून उठलो कां तुमाले आठवाची सवय लागेल हाये, तुमी निजेल ऱ्हायसान तं आवाज कसा द्याव? 
माया डोयातले भाव माय माऊलीनं कशे काजून वळखले अन् मोठ्या मायेनं मले म्हंते कशी कां अरे तुया ध्यानी मनी सपनी आमी ऱ्हायतोच सदानकदा! मंग तुले कायजी कराचं काम नाई पोरा. कायजी त्या लोकाईले करा लागते जे मले टाईमपास समजून येतात. त्याईले वार पाहा लागते, तीथ पाहा लागते, मुहूर्त पाहा लागते. तुया साठी तसं काई नाई रं पोरा. जाय आता बिनधोक घरी जाय!
मोठ्या आनंदात मी जागी झालो भौ आन घरी जायाले निंगालो. पायतो तं काय मंदिराचा दरूजा भाईरून बंद आन मी आत फशेल. 
खरं सांगतो भौ मले जराक बिन कायजी वाटली नाई, मी बसलो आपला पांडुरंग पांडुरंग करीत.
पुजाऱ्यानं पायटी दरूजा खोल्ला न आत आला. मले मंदिरात पाहून चक्रावून गेला, हबकून मले म्हने कां अरे मले जायाच्या पयले आवाज दिऊन थांबवा लागत नोतं काय. रातभर मंदिरात कोंडल्या गेला नसता हकनाक. तसं म्या म्हनलं पुजारी बुवा देवाले तं तुमी रोजच कोंडता, तवा तुमाले कायजी वाटत नाई का देवा.
तसा पुजारी ढसाढसा रडू लागला अन मले म्हने माऊली धन्य तुहे इचार अन धन्य तुहे आचार. म्या म्हनलं जाऊ द्या पुजारी बुवा आता देव चार मैने निजाले गेले हायेत तवा चोख्खट इचार करा आन देव परत येतीन तवा त्याईले कोंडून ठेवा लागीन नाई याची कायजी करा. जातो आता जय हरी.
कवि 'रवि'

Tuesday, 27 June 2023

बरसती बूंदें

बरसती बूंदों का वो मंज़र
तिश्नगी बढा देता है
जिसे भुलाने को चाहा हरदम
घूमकर याद आता है

और प्यास जो धधकती आग सी
उन लम्हों को जलाती है
संगदिल समझने वालों को
वो समां रुला जाता है

नाकाम मुहब्बत को
सलीके से छुपाया था मगर
जब भी होती है बारिश
दिले माशूक याद आता है

झूमती झमाझम से
नाराज़ न हो 'रवि'
तुझे बदनुमा सा ये आलम
औरों को मज़ा देता है 

कवि 'रवि'


Thursday, 22 June 2023

अधूरी आस

वो मिला मुझे एक अरसे के बाद
नाम न रहा, मस्तिष्क में बस शक्ल रही याद
हल्के से थपथपाते हुए मैंने पूछा
भई कहीं मिले थे हम इससे पहले
कुछ आ रहा है क्या याद?

अकस्मात हुए इस मित्रपात से
थोडा वो उलझ सा गया
नखशिख मुझे निहारता रहा
पलभर के असमंजस के बाद
अत्यानंद से वो विभोर हो गया

बोला सहजता से एक बात ऐसी
शतप्रतिशत मेरे ही अवस्था जैसी
महाशय नाम तो मैं भूल गया हूं
पर उस प्रेम भाव को संजोए हुए हूं

अनायास ही दोनों की आंख भर आई
मनुष्य की मनुष्यता से पहचान हो गई
मैंने पहल की और कहा छोड़िये
मित्रता में क्या नामपर अडा रहा है कोई?

नाम को सार्थक स्वीकृति मिलती तभी है
जब चरित्र की चर्चा मित्रों में होती कभी है
हंसकर उसने सहमती जताई
दोनों के आनंद की परीसीमा न रही कोई

सर पर घने काले बालों की उम्र की पहचान
उजड़े चमन के बाद भी इस तरह चढी परवान
नाम जानने की चेष्टा न उसने की न मैंने की
उलजलूल बातें करते करते भेंट संपन्न की

दूर तक उसकी दिशा में मैं देखता रहा
वो जाता रहा उस तरफ परंतु मुझे ही देखता रहा

एक उधेड़बुन दिमाग में लेकर घर आ पहुंचा
विचारों के जंगल में अनेक संभावना खोजता रहा

हां उसकी यादों को संजोना मेरी जरूरत थी
अपनी जान जोखिम में डालकर
उसने मेरी बचाई थी

पर मुझे याद रखना
क्या उसकी भी अनिवार्यता थी

निष्कर्ष बस इतना ही निकाल पाया
पूर्व जन्म का रिश्ता कोई उसने निभाया

हां हो ही सकता है कि वो हो मेरा अपना
उसी के कारण जीवित है शरीर अपना 

हर दिन अब मैं ठीक समय पर वहां जाता हूं
वो फिर नज़र आ जाए, राह तकता हूं
क्या जाने क्यों पर वो नहीं आता
अधूरी आस लिए मैं घर लौट आता हूं

कवि 'रवि'

Wednesday, 21 June 2023

इत्तेफाक

मैं दास्ताने हकीकत का हिस्सा हूं

इत्तेफाक है

चलती चक्की में पीसता हुआ किरदार हूं

इत्तेफाक है

धूप तड़पाती है दरख्तों को जमीं को
धूप से तड़पे बादल भिगोते है ज़मीं को
ज़मीं पैदा करती है फिर और दरख़्त
इस्तकबाल इस क़दर तड़पने का

इत्तेफाक है

राहें चलकर मंज़िल में फना हो जाती है कहीं
सैलाब उफनकर समंदर में खो जाते हैं कहीं
मुहब्बतें पनपकर किताबों में सिमट जाती है कहीं
वो आसमां वाला हमें नज़र आ भी जाता है कहीं

इत्तेफाक है

देर रातों को मदमाती चांदनी लुभा जाती है
तड़पते दिल को सुकून दिला जाती है
खुलूसे दिल से इक रंगीन ग़ज़ल निकल आती है
सहर की भैरवी रुहानी समां बंधा जाती है

इत्तेफाक है 
कवि 'रवि'

Sunday, 18 June 2023

बाप तो बाप होता है

दौरे अदम से आज तक 
जिसका जिक्र अपने आप होता है
वो अलाहिदा हस्ती यानी बाप होता है

सुकून मिलता है हर मुश्किल में
जब अचानक दिख जाता है
खोई हुई तमाम ताकत का
यकायक तजुर्बा होता है
जिसकी नजरों का खौफ
दुष्मन को हिला देता है
वो चट्टान का दूसरा नक्श़
एक अकेला बाप होता है

उम्र के तकाजे से दूर जाकर
जो दिन रात फिक्र में गुजारता है
अपने औलाद का रुतबा बरकरार रहे
इस तमन्ना के लिए
हर ख्वाहिश को भुला देता है
सब कुछ लुटाकर भी
जीतने का एहसास करता है
इस दुनियादारी में
बस एक वो अपना बाप होता है
कवि 'रवि'

Wednesday, 14 June 2023

अचरज

ये क्या हुआ के दिल आशना हुआ
कैसे न जाने क्यों काबिले अफसाना हुआ

सहर की सर्दी में भी ताब का एहसास
खयालों में इशरत और उसका पास
चाय की चुस्की कुछ और ही समझा गई
दिल जो अपना ही था बेगाना हुआ

ये इश्को मुहब्बत की बातें
किताबों को बहाल लगती थी
उसके नजरें इनायत के बाद
आजमाईश का पैमाना हुआ 

मन की उड़ान की रफ़्तार अजब है
उम्र को भूलकर ढाती गजब है 
देरो सवेर ख्वाब टूटना है 'रवि'
ये क्या कम है पलभर जीना हुआ 

कवि 'रवि'

Tuesday, 13 June 2023

मैं और मेरा मय का पियाला

जाम लबालब मय में तरन्नुम
दिले मौसिकी और बहकापन
इक इक लम्हा नाच रहा है
थिरक रही है इक इक धड़कन

मैं और मेरा मय का पियाला
खुदा गवाह है सबसे आला
जो छू ले मदमस्त हो जाए
नहीं रह जायें कोई निराला

रोज़ पियो और रोज़ जियो तुम
कुदरत की हर चीज़ जियो तुम
नयन नक्श से एक है सब तो
क्यों नस्लों के भूखे हो तुम

कहता है कवि 'रवि' सभी से
तोडो फर्जी दीवारें अभी से 
आओ चलकर भेद मिटाएं
इन्सानी फितरत जगाएं

मैं और मेरा मय का पियाला
खुदा गवाह है सबसे आला 

कवि 'रवि'


Monday, 12 June 2023

मान्सून और मानव

मान्सून और मानव

मोबाइली अखबार में
छपकर आया था एल नीनो का हालचाल
पढ़कर हम जैसे रिटायर्ड हुए बेहाल
शाम की जमी हुई मंडली को
मिली थी नयी खुराक
कोई कहे भई बुरा हाल होगा
वर्षा का ऋतुमान इस वर्ष कसर बरपा होगा

एक ने कहा भाई सुनो
अक्सर ये होता है कि अनुमान भटक जाता है
जहां बारिश की संभावना
वहां सूरज आग उगलता है

और

जहां आसमान साफ बताते
वहां धुंआधार बरसता है
ये मौसम का हाल भी एल नीनो की तरह है
जो पनपता है उत्तर गोलार्ध में
और असर दिखाता है दक्षिण गोलार्ध में

क्यों न हम एक प्रयास करें
अपने अनुभव का प्रयोग करें
चंद किताबें वो पुरानी पंचांग वाली
उठाकर निसर्ग की गतिविधि का
अभ्यास करें

प्रगत विज्ञान को आइना दिखाकर
पौराणिक सिद्धांतों की तहकीकात करें

उम्र में पुराणों को सहस्त्र वर्ष हासिल है
तथाकथित प्रगत विज्ञान मात्र
दो चार सदियों की उपज है

हमारे ग्रंथ और इतिहास समय सिद्ध है
और पश्चिमी सभ्यता अभ्यास रत है

आओ चलें सत्य की हुंकार लेकर
फिर एक बार विश्व को ज्ञान दान करें
बचे हुए थोडे समय का
योग्य उपयोग करें 

रिटायर्ड हुए तो क्या हुआ दिमागदार है
अपने जोश और होश के तरफदार है
कवि 'रवि'

Saturday, 10 June 2023

बुत परस्ती

वो लोग
 जो कभी मुझे मेरी जुबान के लिए 
सर आंखों पर बिठा लेते थे।
मेरा बुत बना कर 
मुझे गूंगा कर गये।
अब के हाल ऐसा है
अनजाने लोग आते हैं
चंद फूल, मालाएं, 
और दीपक जलता देखकर,
बडे ही शांत भाव से 
नतमस्तक हो जाते हैं,
पास में रखी हुई दान पेटी में
 कुछ धन अर्पित कर निकल लेते हैं
 पता नहीं 
उस बुत में वे क्या देखते हैं? 
मैं असहाय सा 
अपनी जुबां पर 
लगाये गये लगाम को 
देखता रहता हूं 
पथरीली आंखों के सहारे।
चाहता हूं चीख चीखकर
उनसे कहूं
ये मैं नहीं हूं प्यारों
यह मेरा बुत है
जो तरस गया है
अपनी इस अबादत से
क्यों भुला बैठे हो
मेरे उस अहसास को
जो तुम्हें चराग की मानिंद
अंधेरे से उबार लाता था
बूझे हुए तुम्हारे जज़्बात को
नयी राह दिखा जाता था
मेरे कलाम मेरी तकरीरें
जीने की नयी आस
 बंधा जाती थी
मेरे बुतखाने में आकर
मुझ पर फूल चढाकर
मुझसे कुछ मन्नतें
दुआ मांगते हो
मैं कैसे तुम्हें समझाऊं
मैं यहां नहीं हूं
मैं वहां हूं
जहां मेरी किताबें
किसी किताब घर में
दीमक की संगी बनी है
मेरे अल्फाज़ जो उनमें
बदस्तूर समाएं है
और चाहते हैं के कोई आये
उनपर चढी फफूंद से
निजात दिलाएं
उनके ज़रिए मेरे पैगाम
फिर से जमाने के रूबरू लाएं
सुनो सुनो मेरी चीखें सुनो
मै बुत में नहीं
तुम्हारे दिलों में बसना चाहता हूं
उसी प्यार मुहब्बत और अपनेपन को
जीना चाहता हूं
मैं जीना चाहता हूं
मैं जीना चाहता हूं
कवि 'रवि'

Wednesday, 7 June 2023

माकळाच्या हाती कोलीत

कसं काय?
हे मले इचाराचं हाये का भौ राजकारन कराले काय कोनाले देशाबाहीर जावा लागत असते!?
का मंग राजकारन आपल्या मानसाईच्या मंधी ऱ्हावून, त्याईचं सुख दुख समजून, त्याईचं भलं कायच्यानं व्हईन त्याचा इचार करून व्हत असते!!?
नाई म्हंजे कसं हाये का सौताले भावी परधानमंतरी म्हूनशान दिवसा रात्री जो सपनात पायते थो ज्याले कांग्रेस वाले युवराज युवराज करून मुजरा करतात थो रावुल बाबा तिकळे ईलायतेत जाते, अमेरिकेत जाते अन् भलकाईच्या भलकाई बोंबाबोंब करत फिरते. ह्या गैभान्याले इतलं बिन समजत नाई राजे हो का बाबुन्या अरे तू जे काई तथी भकलतं थे जसं च्या तसं अथी आपल्या देशात एकून एक जन समक्ष पायते. नाई जमलं त यूटूब वर फुरसतनं पायते आन पोट्ट्याई पासून तं मथाऱ्या लोग सारे च्या सारे लय मजा घेतात भौ. आपल्या मायबोलीत एक म्हन हाये कानी भौ का म्हंते "धड बोल नाऱ्या, तं म्हने घराले आग लागली".
आता हे काय देशाचं भलं करनेवाल्याचं लक्षन हाये का भौ. अशा बैलंभारतीच्या हातात सत्ता देल्ली तं साऱ्या देशाचं वाटुळं व्हईन कानी भौ?
तं माह्य सांगनं हेच आये का ह्या कांग्रेस वाल्याईची अशी कोंती नस ह्या गांध्याईच्या बुडाखाली दबेल हाये कां हे सारे त्याईच्या म्होरं नीरा मुर्दाड बनतात भौ. खरं पायलं तं आपल्या महाराष्ट्रातले कांग्रेसी नेता आपापल्या परीनं सौताची आब राखून हायेत कानी भौ? मंग त्याईनं सौताले अलग करून एखांद्या नवीन पक्षाची स्थापना करून वालं व्हाव कानी. अरे म्याटाच्या संगतीनं सारे म्याटच व्हतीन, खरं हाये कानी भौ?
अन समजा हे जर कां त्याईले जमत नशीन तं मंग आता एकच उपाय शिल्लक ऱ्हायते भौ कां साऱ्याच्या साऱ्या कांग्रेस वाल्याईले द्याचं धक्क्यावर लावून आन कराची "जै रामजी की"
चला भौ,रजा घेतो. पाहा, पटत अशीन तं बाकीच्याईलेई सांगजा.
कवि 'रवि'

Monday, 5 June 2023

अब क्या कहें

अब क्या कहें, मौसम नागवार गुजरा
हर शख्स को मेरा करतब, नागवार गुजरा

एक कवायद करता रहा, हंसूं और हंसाऊं
तमाशबीन हज़ार थे, किरदार नागवार गुजरा

वो पैमाना, जो जीने का मक़सद बनाया था
मैं खुश था मगर औरों को नागवार गुजरा

क्या लोग क्या रवायतें, ख़ालिस बकवास
हकीकत से यूं रूबरू होना नागवार गुजरा 

राहे अमल की चाहत वो तेरी, शानदार थी 'रवि'
इम्तिहानों से जूझना उन्हें नागवार गुजरा

कवि 'रवि'

 


Thursday, 1 June 2023

कारवां ए बदहवास

वो कहता रहा
अगले मक़ाम तक
मेरा साथ दो
मगर
रहगुज़ार निकलते गये 
कारवां बिछडता गया
अपने अरमानों को
गठरी में बांध
वो असहाय, नाक़ाबिल 
घिसटता रहा उस तरफ
जिधर चंद चलती हुई लाशें
धुंधली सी नजर आ रही थी
बावक्त उस इन्सान का
यह बेवक्त बिखर जाना
क्या उसकी फितरत समझें
या के फिर नाकारा कुदरत

लोग कहते हैं 
अक्सर गूफ्तगू करते हैं 
भई इन्सान तो बहुत अच्छा था
पर ख़याल
इन्कलाबी रखता था
हो न हो इक दिन उसका
यही हाल होना था
................

यूं ही घसीटते हुए फिर कभी
उसे दूसरी दुनिया मिल गयी
...........
राहत की सांस लेते हुए
इधर की दुनिया ने उसे
पुतला बनाकर रच दिया
एक चौराहे पे

साल के तीनसौ चौसठ दिन
परिंदे उसके साथ होते हैं
पर एक दिन
उसकी मौत का मातम मनाने
वही दरिंदे आ धमकते हैं
अपना महंगा अभिवादन 
उसकी तरफ उछालते हैं
फर्राटा भरने वाली
बडी बडी टायरों वाली
गाड़ियों से धूल चखाकर
निकल जाते हैं 

जिन्होंने कभी उसके बताए
राह पर चलते चलते
उसी को अनदेखा कर
अपना स्वार्थ कमाया था
गैंडे की खाल पहने
मगरमच्छ का दिल लिए
सियार की बुद्धि की
आजमाइश करने वाले
वे सभी आज एक दिन
आते हैं 
कदम दर कदम
हार फूल रुपए वगैरह चढाते है
बगैर आंख मिलाए
उसके गुणगान करते हैं
अपने ही नज़रों में सिकुड कर
धीरे से फाख्ता हो जाते हैं

वह खडा है लेकिन
इस इंतज़ार में
के एक दिन कोई आएगा
उसकी राह को अपने
विचारों में तब्दील कर
एक नया दौर लाएगा
ताकि फिर कभी उस मक़ाम तक
पहुंचने के लिए
कोई राहगीर नहीं गिड़गिड़ाएगा
बडी संजीदगी से
वह कह सकेगा

तथास्तु.. तथास्तु... तथास्तु !
कवि 'रवि'