Wednesday, 28 July 2021

कसक

खामोशी ही अब जुबां का किरदार है
ये आलम कुछ और ही असरदार है
अक्सर अमल रहता है दिमाग पर
उन विचारों को जीने का दिल हकदार हैं
तारीख में मिलते हैं हजारों झूठ ऐसे
नाराज़ शख्सियत जंग करने को बेकरार है
इस माटी का भी कर्ज़ होता है इंन्सां पर
जान कर भी पिछड़ा हूं, जेहन शर्मसार है
उम्र का तकाजा है बड़ी देर हुई है 'रवि'
कुछ बोल ही दे दुनिया को इंतजार है
कवि'रवि'

पैसे से प्यार

इस पैसे की भूखी दुनिया में
मानवता का काम नहीं
सच और झूठ सब बिकता है
धर्म नियम का नाम नहीं.....इस पैसे की भूखी
रोज़ इश्तहार लुभावने
खुद को बिकवाने वाले
चकाचौंध में पुलिंदे है
हैं सभी खास, कोई आम नहीं.....इस पैसे की भूखी
सेवा का बहाना है
मेवे पे निशाना है
हैं चर्चे में वो ही जिसे
ठगने के सिवा कोई काम नहीं...इस पैसे की भूखी 
दिन निकलें उनकी ही छबी
सब 'पेड प्रमोशन' का जलवा
हम रोज़ जगाएं दुनिया को 'रवि'
हमको की भला आराम नहीं...इस पैसे की भूखी
कवि'रवि'

Thursday, 22 July 2021

श्री गुरु पूर्णिमा: एक चिंतन

श्री गुरु पूर्णिमा! 
एक प्रयास होता है मानवी जीवन में कृतज्ञता व्यक्त करने का। सनातन संस्कृति में गुरु को अनन्य साधारण महत्व दिया गया है मुख्यतया इसलिए कि ये शाश्वत सत्य है, मनुष्य का बौद्धिक विकास गुरु के सहायता विना अशक्य है। क्या अपना एक गुरु हो सकता है? उत्तर है 'नहीं'।
गुरु के वयानुसार अवतरण
१ निसर्ग: जन्म के साथ रोना सिखाकर अपने अस्तित्व की पहचान दुनिया को कराता है।
२ माता: उस रुदन को सुनते ही स्वयं की स्थिति, प्रसुति दर्द को भुलाकर पोषण का जिम्मा उठाती है।
३ पिता: जीव को उन सभी स्थितियों से अवगत कराता है जो कि सुदृढ़ व्यक्तित्व बना सकें।
४ मित्र: जो बाल्यावस्था से ही सहजीवन का पाठ पढ़ाते हैं।
५ बांधव: पारिवारिक जीवन की आवश्यकता को सुलझाने की रीत जिनसे प्राप्त होती है।
६ शिक्षक: सामाजिक,सामुहिक तथा सामुदायिक जीवन की परिभाषा से अवगत कराते हैं, विभिन्न शास्त्रों से अवगत कराकर विशेष प्राविण्य प्राप्त करने में सहायक बनते हैं।
७ स्वानुभव: स्वयंसिद्ध बनने में अहम भूमिका निभाता है।
८ जीवन साथी: एक ऐसा गुरु जो किसी भी परिस्थिति में उत्साह में वृद्धि ही करता है। 
९ प्रवास: सृष्टि, चराचर के ज्ञान से परिपूर्ण बनाता है।
१० वृद्धावस्था: मनुष्य को जीवन की सभी विधियों से मुक्त करा कर ईश्वर से जोड़ने में सहायक है।
११ मृत्यु: अंतिम सांस भी क्या होती है सिखाता है। 
गुरु पूर्णिमा के इस परम पूजनीय पर्व पर आशा है आप को मेरा यह कथन संतोष दिलाएगा।
गुरु: ब्रह्मा: गुरु: विष्णु: गुरु:देव: महेश्वर:
गुरु: साक्षात परब्रह्म: तस्मै श्री गुरुवे नमः
कवि'रवि'

एक ग़ज़ल

बाज़ आया तो कभी फिर से गुनाह कर दूंगा 
पैमाना ए मुहब्बत बे पनाह कर दूंगा
आयी गर याद तो दरीचे पे आ जाओ
रंगीन कहानी को कुछ और रंगसार कर दूंगा
पेशतर वो मोहब्बत का अफसाना है रंगीन
दो शेर लिखकर उसे लाजवाब कर दूंगा
हैं आसमां शामिल 'रवि' ऐसी तलबगोई में
बिखरी हुई फिजां को सुर्ख लाल कर दूंगा
कवि'रवि'


Tuesday, 20 July 2021

समय के साथ कटिबद्धता

सुबह की राम राम मित्रवर। इस देश की धरा हरी चादर ओढ़े नये अवतार में फिर से अपने सृजन शीलता का सभी जीवों को आल्हाददायी कर्तव्य निभाने को तत्पर है। लेकिन हम स्वार्थी मनुष्य जीव उसके खुशहाली का प्रयास करने में चूकते हैं जबकि इतर सभी जीव अपना दायित्व बराबर निभाते हैं। कृषक, जिसे औरों के अपेक्षाकृत अधिक समयसूचकता होनी चाहिए, वो नकारात्मक ऊर्जा से लिप्त हो रहा है यह देख कर धरती माता के हृदय से विद्ध होने की भावना स्पष्ट गोचर हो रही है। पशुहत्या को पाप न समझ कर उसके मांस को व्यंजन की तरह परोसा जाने पर निसर्ग हमें क्या अभिशाप दे रहा है इसकी कल्पना मात्र से ही मन खिन्नता से भर जाता है। चौमासा की शुरुआत हो गई है और धर्म शास्त्र के अनुसार मनुष्य जीव को सात्विकता का अनुसरण करने का अनुरोध किया जाता है। आइए हम सब मिलकर इसे प्रकाशित करें। जय श्री राम 🙏

Monday, 19 July 2021

पांडुरंग पांडुरंग

सुप्रभात मित्रवर, आज महाराष्ट्र-आंध्र-तेलंगना-कर्नाटक के आराध्य दैवत श्री विठ्ठल पांडुरंग पंढरीनाथ महाराज जी के उत्सव का दिवस है। संपूर्ण भारत में आज देवशयनी एकादशी भी मनाई जाएगी। ऐसी पावन बेला पर मन की प्रसन्नता बढाने में सहायक मित्रों की शुभकामनाएं प्राप्त होती है तो होंठों पर अनायास ही शब्द आ जाते हैं " पांडुरंग पांडुरंग, पंढरीनाथ महाराज की जय"। ऐसी मान्यता है कि भक्त पुंडलिक के खातिर साक्षात भगवान विष्णु यहां पंढरपुर में पधारे, पंहुचे तो पुंडलिक अपने पिता की सेवा में व्यस्त थे, भगवान ने पुकारा पुंडलिका मैं आया हूं! तो पुंडलिक बोले मैं माता-पिता की सेवा कर रहा हूं, उठ नहीं सकता, थोडी प्रतिक्षा करो। तो भगवान बोले 'मुझे आसन तो दो', भक्त पुंडलिक ने सामने ईंट नज़र आई तो वही बाहर फेंक कर कहा 'लो' विराजमान हो जाओ। तो प्रभु उस ईंट पर खड़े हो गए। युगे अठ्ठाविस विटेवरी उभा, कर कटावरी ठेवोनिया। तभी से पंढरीनाथ महाराज हाथ कमर पर धरे ईंट पर विराजमान है। हरि पांडुरंग भक्तवत्सल है, दिन दुखियारों की माऊली है। पांडुरंग पांडुरंग पांडुरंग पांडुरंग 🙏🙏🙏🙏

Sunday, 18 July 2021

आषाढी आणि मन

आली आषाढी आषाढी मन पंढरी पंढरी
पाया बांधिला जोखड देवा कशी करू वारी
एकादशीचे दिवशी भक्त विठ्ठलाचे पायी
डोकं ठेविता चरणीं मन तन शांत होई
आलो तुझ्या दर्शनाला देवा भरून पावलो
वैकुंठ मिळाला देवा धन्य धन्य झालो
माऊली माऊली तुची आम्हा सर्वकाही
पांडुरंगा तुझ्या विना त्राता दुजा कोणी नाही
कवि'रवि'

करामत

शेख यूं मैकदे की गली से गुजर गया
खता मैख्वार की बदनाम साकी को कर गया
वो अब्र थे जो तजुर्बे को बहा ले गये
सितम तब हुआ वाईज़ को नापाक कह गया
न शराब होती न रिंदगी होती न कुफ्र ही होता
कश्मकश की ताबीर में हकीकत को खो गया
इश़रतों के इन्कलाबी सैलाब थे पुरअसर 'रवि'
कश्ती ए रिवायत के संग साहिल पे रह गया
आरज़ू ए जन्नत का आलम था इस क़दर
दोज़ख के लुत्फ से भी नावाकिफ रह गया
कवि'रवि'

Saturday, 17 July 2021

डॉ कादंबिनी गांगुली जी का जन्म दिन

जय श्रीराम
डॉक्टर आनंदी बाई जोशी तथा डॉक्टर कादंबिनी गांगुली १९वी सदी की वो भारतीय महिलाएं है, जिन्होंने अपने अदम्य उत्साह से तथा अतार्किक मानसिक शौर्य से आधुनिक उपचार पद्धति का अध्ययन कर डॉक्टर की पदवी हासिल की और भारतीय नारी शक्ति का सम्मान बढाया। वो दौर ऐसा था जब भारत में नारियों को परिवार से या समाज से ऐसा कोई प्रोत्साहन नहीं मिला करता था कि वे ऐसा साहस कर पाएं। किंतु, प्रखर विचार से कोई ध्येय लेकर आगे बढ़ें तो समुद्र भी राह बना देता है, इस उक्ति को तत्कालीन इन महिलाओं ने सार्थक किया है। 
वो ऐसा दौर था जब पूरे देश में वैचारिक क्रांति की नींव रखी जा रही थी और भारत एक देश एक राष्ट्र का का रूप धारण कर रहा था। २०वी सदी के प्राथमिक दशक एकात्म भारत के वृक्ष की जड़ें मजबूत कर चुके थे, और उस यज्ञ में आहुति देने के लिए हर आयु का भारतीय नागरिक लालाइत था। 
कुछ उसी तरह आज भी वैचारिक क्रांति का दौर हम अनुभव कर रहे हैं, और आज विशेषतः युवा पीढ़ी अपने हित अहित से सजग हो कर इस देश में शुद्धीकरण की प्रक्रिया को आकार दे रही है। 
भारत विश्वगुरू था इस वास्तविकता को जीने की चाह ने युवाओं में जोश भर दिया है और इस सदी का सबसे अधिक युवा जनसंख्या वाला हमारा देश फिर से अपने उस स्वर्णिम युग की पुनरावृत्ति की ओर अग्रसर है। 
दिनांक १८जुलाई १८६१ को जन्मीं डॉ कादंबिनी गांगुली जी का स्मरण करते हुए मैं इस उभरते हुए भारत के उन सभी विद्वज्जनों को बधाई देता हूं और फिर से हमारा परचम उत्तुंग लहराएगा ऐसी कामना करता हूं। 
|भारत माता की जय|
कवि'रवि'

Thursday, 15 July 2021

एक सवाल

नज़र के आगे धुआं-धुआं सा क्योंकर है
आबे चश्म रुक्सार पे रुका-रुका सा क्योंकर है
जिंदादिल वो था फिर ये क्या हुआ
हर लफ्ज़ लबों पे थरथराया सा क्योंकर है
रुबाई के आगोश में गुजरी है रात सारी
गज़ल का उनवान यूं डरा-डरा सा क्योंकर है
हर शख्स की अपनी कहानी है अगर
ज़माना बदलेगा ये कहकर वो मरा-मरा सा क्योंकर है
गर चे दिलो दिमाग पर रहता न अमल कोई
ख्वाहिशें लेकर वो दबा-दबा सा क्योंकर है
मैं न हूं तो ज़माना भी नहीं होगा 
ये सोचकर वो हारा-हारा सा क्योंकर है
है ख़ाक ही हकीकत 'रवि' अफसोस कैसा
मिटने के बाद भी तू बाकी जरा-जरा सा क्योंकर है
कवि'रवि'

Wednesday, 14 July 2021

हर पल है नागवार

हर पल है नागवार शिकायत किससे करें
धोखा है बार-बार शिकायत किससे करें
इऩसां के उसूलों में 
दश़्ते रवायत आ गई
काजी है कुफ्रसार शिकायत किससे करें
राहों में है दुष्मन
जिंदगी आम हो गई
दवा न दुआ असरदार शिकायत किससे करें
ये मोजिज़ा ही तो है 
हमें एहतराम आया
संगदिल है सनम शिकायत किससे करें
हाशिए पर थी अबादत 
सब़र नाकाम हो गई 'रवि'
हर दिल में है खंजर शिकायत किससे करें
कवि'रवि'

Monday, 12 July 2021

ज्ञात वा अज्ञात

ज्ञात वा अज्ञात तो जरी
मी विसंबुन तयावरी
मज श्वास ही देतो
 बघा शब्दांप्रति ती वैखरी

वाटेत अंधारात त्या
विश्वास तो आहे पुढे
पाउले त्याची दिसावी
अन हस्त तो माझ्या शिरी

मातेचिया पान्ह्यात तो
पितरांचिया नेत्रांत ही
मित्र सखे त्याचीच रूपे
त्याची कृपा अशी मजवरी

जग म्हणे रे फाटक्या 
तुजला श्रीमंती न कळे
मी तयां हासून म्हणतो
हा खेळ आहे ईश्वरी

कवि 'रवि'

Thursday, 8 July 2021

वाकया और वास्तव

राह चलते उस मकाम पर
उस भिखारिन ने असमंजस में ही लेकिन
मुझसे पूछा " बाबा कुछ मिलेगा"!?
उसे चौंकाते हुए मैंने पर्स निकाला
और दस रुपए थमा दिए
अचरज से उसकी आंखें चमक उठी
वो पूछ बैठी सब के सब!?
मैंने एक नज़र उधर देखा 
मेरा मन मुझसे ही पूछ बैठा
क्या ये तेरी औकात को पहचानती है
मैं कुछ कहूं इससे पहले 
वो मेरे पांव पर झुकी
मैं शर्मिंदा! कुछ कह भी न पाया
क्या बताऊं उसे कि हां ये मेरे हक के है
जो मैंने तुम्हें दिये
मेरी भी पाकीट मनी होती है
जो मेरे बच्चे मुझे देते हैं
शायद बहुत भूखी थी छूटते ही 
रेहड़ी पर कुछ खाने चली गई
मैं सोचता रहा उसमें और मुझमें क्या फर्क है
बस इतना की वो दान कमाती है
और मुझे दान दिया जाता है
वो उसके कमाई की मालकिन है
और मैं खर्च का हिसाब लिखता रहता हूं
के ना जाने कल किसी वक्त
मुझे दान करने वाले जवाब मांग लें
और मैं बता न सकूं ...और मैं बता न सकूं
कवि'रवि'

Wednesday, 7 July 2021

ईश्वरीय अपेक्षा

सर्वात्मक आणि सर्वेश्वर तोच जगन्नियंता आहे. आपल्या शरीर रुपी यंत्राचा दूर नियंत्रक (रिमोट कंट्रोल) त्याच्या हाती आहे. असे असले तरी माणसाला बुद्धी देऊन त्याने काही प्रमाणात त्याला स्वचालित ही केले आहे. जसे की झोप येत नसेल तर झोपेची गोळी आहे, जागं होता यावं म्हणून 'आलाराम' ( हा विशेष वऱ्हाडी शब्द) लावता येतो. प्रवास निश्चिती करून स्थलांतरित होता येते. अन्ना साठी दाही दिशा आम्हा फिरविशी जगदिशा, असं व्यंकटेश स्तोत्रातील एका लोकात उद्धरित आहे पण ठरवून पिकनिक ला जाण्याची शक्कल मानवनिर्मित आहे. म्हणून सगळं काही ईश्वर करतो, तोच घडवून आणतो असे भ्रामक विचार जोपासू नयेत. त्याने जे काही द्यायचं ते आपल्या जन्माचे वेळी आपल्याला देऊन टाकले आणि त्याचवेळी श्वास घेण्यापासून सगळं काही आपण करायचं आहे अशी कंडिशन सुद्धा लावून दिली. त्यामुळे "जीवन संघर्ष" हा शब्द आपला की वर्ड आहे. जे काही आपल्याला कमवायचे आहे ते प्रयत्न पूर्वक आणि कष्टातून साध्य करायचे हा अर्थ त्याला अभिप्रेत आहे. म्हणून जगताना प्रत्येक विषयाच्या अनुषंगाने अध्ययन, परिणाम वगैरे बाबींचा सारासार विचार करण्याची गरज आहे. पाण्यात उडी मारण्यापूर्वी पोहणं येतं का हा निकष आहे तसेच कोणत्याही कार्याची सुरुवात करण्यापूर्वी त्यातील ज्ञान कितपत अवगत आहे ते ही महत्त्वाचं आहे. सारांश सर्वस्वी ईश्वरावर अवलंबून न राहता आपल्या मर्यादा ओळखून किंवा मर्यादांचा आवाका वाढवून इप्सित साध्य करण्यासाठी प्रयत्न करावेत हाच ईश्वरी संकेत आहे. जय श्रीराम जय श्रीराम जय जय श्रीराम 🙏

Monday, 5 July 2021

कानून अव्यवस्था

 न्याय देवता की आंखों पर पट्टी बांध कर उसे न्यायालय में यही कारण से रखा गया है कि वह न्यायालय में उपस्थित तो रहें लेकिन कुछ भी देखें नहीं। और, न्याय का व्यवसाय करने वाले खुलेआम न्याय देवता का चरित्र हनन कर सकें। न्याय देवता के हाथ में दिया गया पलडा भी एक तरफ झुका रहता है जो न्याय देवता देख नहीं सकती।
चलते चलते एक मूलभूत विषय पर प्रकाश डालना चाहूंगा कि इस देश में ऐसी कोई विशेष शिक्षा सुविधा आज तक भी नहीं है जो न्यायाधीश पद के लिए विद्यार्थी दशा में ही विशेषज्ञ पदवीधर तैयार कर सकें। सामान्य वकीलों को एक परिक्षा प्रक्रिया से जोड़ कर ( जिसमें काफ़ी तृटियां है, जहां से ही भ्रष्टाचार का उद्गम होता है) न्यायाधीश का चयन किया जाता है। न्यायालय एक ऐसी जगह बन गई है जहां ईश्वर को हाज़िर नाजिर मान कर झूठ का कारोबार धड़ल्ले से चलाया जाता है। देश में कुछ ऐसे खानदानी जज है जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी न्यायाधीश पैदा कर रही है और उच्चतम न्यायालय तक इनकी पैठ बनी रहती है।
"न्यू इंडिया" नये भारत का नारा देने वाली हमारी सरकार आइये देखें इस दकियानूसी कानून व्यवस्था को कब तक हम पर थोंपे रखती है।
भारत माता की जय
कवि'रवि'






मतितार्थाने "साधना"

"साधना" मला ह्या शब्दाचा अर्थ समजून घेणं आधी आवश्यक वाटते. एखादी विद्या अर्जित करायची असेल तर त्या साठी करायला लागणारा प्रयत्न म्हणजे साधना. साधना सफल झाली तरच सिध्दी प्राप्त होते. म्हणजेच एकार्थाने साधनेत एकाग्रता येणे ही प्राथमिक गरज आहे. तेंव्हा साधनेला बसलो असताना चित्त शांत आणि संयमी होत नसेल तर त्या स्थितीला साधना म्हणणे उचित ठरणार नाही. मुळात साधना करायची ती कशासाठी हे स्पष्ट असायला पाहिजे म्हणजे साधनेला ध्येय निश्चिती आवश्यक आहे. साधक हा एक प्रकारे संशोधक असावा लागतो, त्याचे ठायी ती ध्येयाविषयीची निष्ठा असणे अपेक्षित आहे. जर कां तुम्ही साधनेला बसले असताना मन सैरभैर होते आहे तर तेथेच थांबावे आणि त्या भ्रमितावस्थेला सोडून द्यावे. मग असा प्रयत्न करूच नये कां? असा प्रश्न साहजिकच उद्भवणार, त्यासाठी साधनेची पूर्वतयारी करावी. जसे की, पूजा अर्चना साग्रसंगीत पद्धतीने करण्याची सवय लावून घ्यावी. पूजाअर्चा करताना यथाविधी करता आली पाहिजे. सगळे उपचार निश्चित रुपात नित्य नियमाने जमायला पाहिजेत.कित्येक लोक जप करताना किंवा स्तोत्र म्हणताना शास्त्रोक्त उच्चारण करीत नाहीत, आरतीचे ही तसेच असते शब्दोच्चार स्पष्ट आहेत का, तालबद्ध आहेत का, लयबद्ध आहेत का ह्या सगळ्या गोष्टी लक्षात घेऊन पहिले त्यात प्राविण्य मिळवले पाहिजे. ते एक शास्त्र आहे हे आणि त्याची बंधने आहेत हे मान्य करून पूजा विधी करावा. हे व्यवस्थित जमायला लागले की त्यात पारंगत होण्यावर लक्ष केंद्रित करावे. व्यवस्थित जमतंय का ह्याची खात्री करून घ्यावी. ही झाली साधनेची पूर्वतयारी. शक्यतो साधनेची वेळ रात्री उशिराची ज्यावेळी सर्वत्र नीरव शांतता प्रस्थापित झालेली असते ती निवडावी. ब्रह्म मूहूर्त हा मंत्र पठण करण्यासाठी असतों, म्हणजे त्या वेळी आपली जीभ, कान आणि वाचा अर्थात स्वर हे वापरात असतात त्यामुळे ती वेळ साधनेची नाही हे लक्षात ठेवा. साधना ही स्वरहीन आणि आत्मकेंद्रित असते. त्यामुळे पंचेंद्रीयांना संयमित करून अंतस्थ ऊर्जेला प्रवाहित करायचे असते. साधना मनोरंजन असू शकत नाही हे मनावर बिंबवणे नितांत गरजेचे आहे. साधक हा आजच्या भाषेत स्कॉलर असतो आणि फेलोशिप साठी ऍस्पायरंट असतो. मला वाटते भावांनो माझं हे वक्तव्य तुम्हाला पटेल. जय श्रीराम जय श्रीराम

Sunday, 4 July 2021

अक्सर के जिंदगी में

अक्सर के जिंदगी में 
ऐसा समां आता है
उम्र भर का जुनून 
जाने कहां खो जाता है

मैं न मैं रहता वो न वो होता 
ये मोजिज़ा है 
मैं उसमें वो मुझमें फना होता है

न था दस्तूर 
के करूं मैं उसका इस्तक़बाल
जब वो आता है 
ठिकाना उसने चुना होता है

अब देर बहोत हो गई है 
क्या उससे दुआ करूं
जो मुझमें है बसर 
सब उसका दिया होता है

क्या मांग के लाये थे 
क्या दे जा रहे 'रवि'
तारीख में लिखा जाता है वो 
जो उनको पता होता है
कवि'रवि'

Friday, 2 July 2021

तिश़नगी और सफ़र

तिश़नगी अब तो
दिलों जां में बसर करती है
हो ग़मगीन अगर दिल तो 
कुछ और भी असर करती है

मेरी तन्हाई मेरे मर्ज़ का सामान बन
जख़्मों पे नमक का किरदार अदा करती है

ग़मे जिंदगी को बस इतना ही गुमान है
ज़ेहन पर होके सवार सांसें सफ़र करती है

दिल दिमाग और शरीर की
हैसियत क्या है 'रवि'
जब आत्मा से उठती लहरें
ब्रह्मांड का सफ़र करती है

कवि'रवि'


अज़मत

वो चलता रहा राहे बेमंजिल़ यारों
दुवा फिर उसके लिए कंकरो कांटे करने लगे

रिंदगी कुछ ऐसी कभी देखी न थी
मैकदे भी उसका दम भरने लगे

वो आता है रूबरू जब भी
चश्मे सख्त भी आबदार होने लगे

ले अब हर शय को है इक बहाना काफी
उसे देखकर रास्ते बदलने लगे

ये मुकद्दर का अजब खेल है 'रवि'
तेरी बर्बादी को इश़रत कहने लगे

कवि'रवि'