Saturday, 30 April 2022

महाराष्ट्र माझा

कृष्णा गोदा भीमा कोयना
मुळा मुठा च्या सह ती पवना
तापी पूर्णा वर्धा वेण्णा
इंद्रायणी कुंडलिका ही जाणा
पंचगंगा अन पाताळगंगा
वऱ्हाड भिजविते पैनगंगा
तिला सोबती ती वैनगंगा
नीरा रंगावली भातसा
चंद्रभागा अन तशी तानसा
नाग नदी सौंदर्य वाढवी
कन्हान अमुची तृषा भागवी
किती वर्णाव्या ह्या जलदात्री
अतुट तयांची आम्हांवरी प्रिती

सातपुडा संह्याद्री अजिंठा
सातमाळा चा अमूल्य वाटा
तोरणमाळ अधिक तो पन्हाळा
शिरसोली डोंगरही मोठा
उत्तर दक्षिण दूधगंगा
सवे भुषविती चिकोडी रांगा
बालाघाट ही असे संगती
भव्यता तयांची वर्णू मी किती

कला कुशलता समृद्ध आमुची
धार जहाल ती तलवारीची
स्वराज्याचा एल्गार जहाला
शिवबा अमुचा राजा झाला
भूक शमविते अमुची माती
बळीराजाचे कष्टही किंमती
उद्योगांचे जणू नंदनवन
भक्ति प्रार्थनेने ही पावन
संत महात्मे उदंड झाले
कर्मयोगी जन भरुन पावले 
शांति प्रीतिची सदा कामना
धर्मापरी तरी दृढ भावना
असा असे महाराष्ट्र हा माझा
कवि'रवि' च्या कवनांचा राजा
जय महाराष्ट्र
कवि'रवि'

Friday, 29 April 2022

छंदमुक्त

हां ये ब्रह्माण्ड भी है एक छंद का गुलाम
इन्कलाबी विचारों से जागृत होता है कभी कभी
पर छंदबद्धता के आगोश को नहीं भेद पाता
समय कहिए या काल, कराल है उसकी करनी
या कहिए कि काल भी है छंद के क़फ़स में बद्ध
सृष्टि और सौगात अपनी नेमत की कायल
बहु आयामी मानव भी जीवन चक्र में छंदबद्ध
लेकिन एक बात अवश्य है 'रवि' जो सबके परे
छंदमुक्त हो कर निकल जाती है आत्मा बन कर
कवि'रवि'

स्याह रातों का सफ़र

स्याह रातों का सफ़र
मैं मंजिल से बेखबर
चरमराते है पत्ते
बेगुमान कदमों तले रौंदकर
तन्हाई की गूंज
दिमाग को झंझोडती हुई
न साथ करने को खयाल ही है
न अरमां न हीं हमसफ़र
पत्थर से लगी चोट 
एक आह निकाल लाती है
एहसास जाग जाता है
एक अनबुझी अबादत का
क्यों न खोजूं मैं कभी
सहारा किसी साहिल का
कुदरत तेरे अहले करम
मैं मुस्तफा मेरे दिल का
कवि'रवि'

Question unrevealed

Why on the earth
There's a race among the races
Why on the earth
Mankind's with different faces
Why on the earth
We don't believe to live
Live with the harmony
Why our act's ruled by money
We know it very well
Money can't be the way
To heaven or hell
Why on the earth
There's always unrest
Why don't we follow
The nature's behest
Why why why 
the zest for the power
We are nothing
Without almighty's 
merciful shower
We come from nowhere
And we go to nowhere
Yet we have ambition
To conquer forever
Let's now accept 
the weakness in us
And opt for the peace 
and not to rush
Poet'Ravi'

Thursday, 28 April 2022

नन्हा सा दिल

नन्हा सा दिल 
और हसरतें हजार
यह करूं या वह करूं 
खयालों की भरमार
एक एक पल है 
दिल में हलचल
जेहन है बेजार
न शब ही सुहानी 
न सहर में सुकून
पग में सिहरन 
बारंबार
तन और मन का
मेल नहीं है
अजीब है कारोबार
'रवि' जहां में 
कहीं नहीं है
इस विधी का उपचार
कवि'रवि'




वो पूनम की रात

वो पूनम की रात.....तेरा हाथों में हाथ
अधरों पर सिमटे हुए वादों का साथ
मन ही मन मुस्कुराती तेरी छबी
किसी मंथन में उलझी वो पूनम की रात

वो पूनम की रात..... अनचाहे ढलती गई
सुबह के आभास से प्रीत सिकुड़ती गई
मेरे अंतर में बुन रही थी जो बात
सिले होंठों के भीतर ठिठुरती गई

वो पूनम की रात.... फिर आती हैं
सपने सजाती है दिल में अरमान जगाती हैं
गाहे बगाहे मेरे साथ मेरी छबी
नदिया किनारे उभर आती हैं

वो पूनम की रात......अब धुंधली हो रही है
प्रतिक्षा की आयु भी ढलती जा रही है
पर मन है कि बैठा है बंधाए हुए आस
इस पूनम पर तो होगा उसके आने का एहसास
इस पूनम पर तो होगा उसके आने का एहसास
कवि'रवि'

Wednesday, 27 April 2022

श्याम तुम्हारे अधर की बन्सी

श्याम तुम्हारे अधर की बन्सी
नादमधुर सुर को जन्माती
सुनकर रम्य लय उस धुन की
गोप गोपियां भी भरमाती
श्याम तुम्हारे चतुर जिव्हा ने
घोर धुरंधर यूं भरमाये
ना करते जो नमन किसी को
तुम्हें भजने में नहीं शर्माएं
श्याम तुम ही हो जग जन जीवन
तुमही सांसें तुमही चितवन
श्याम तुम्हारे बिन सब "छाया" (अंधकार)
वृथा 'कृतार्थ' सब मोह माया
कवि'रवि'

Monday, 25 April 2022

अपना हुनर

ग़ालिब का हुनर ग़ालिब को पता
हम तो सुनाते हैं अपनी खता
                      रंजो ग़म की नुमाइश 
                      करने वाले तूने
                      इशरते अहबाव को कभी 
                      अजमाया ही नहीं
साक़ी से खतावार तू 
रिंदों से भी नाराज़
महफ़िल में चढ़े बाज़ को 
कभी जाना ही नहीं
                      अश्कों को सहेजता रहा
                      रोशन न रहा तेरा आज
                      के वफ़ा का अहसास कभी
                      दिल में संजोया ही नहीं
फितरते मैख्वार जाहिर है 'रवि'
ग़मख्वार को जन्नत
क्योंकर नसीब ही नहीं
कवि'रवि'

Wednesday, 20 April 2022

Blue Nile and me

On the banks 
of the blue Nile
                     had a chance 
                     to live for a while
Seeing me there 
she had a smile
                    I too replied her
                    in my style
Sitting on the banks 
I had a dream
                    I too am a part of 
                    her blue stream
Singing 
of that lovely Breeze
I more felt warm 
and at ease
                   Oh those charming 
                   yatchs and fishes
It all became 
as was in the wishes
                   Now I think 
                   after so long
I left it there 
is utterly wrong
                   can't express how much 
                   I love you 'Nile'
You are in my heart 
leaving all the agile
                  May I wish 
                  to fly to the scene
For your perenial 
lively mean
For your perenial lively mean
Poet 'Ravi'

(This poem relates to my stay in Khartoum, Sudan in the year 1984, but written today after 38 years)

Tuesday, 19 April 2022

लाल परी आणि भुकेला कर्मचारी

सकाळच्या लॉंग वॉक साठी बाहेर पडलो
बस स्थानकाजवळ आलो तसा अवघडलो
चालता चालता दूरवर आलो केंव्हा कळले नाही
डाव्या बाजूला सहजच माझी नजर वळली नाही
लाल परी चं ते बस स्थानक हताश दिसलं
मला पाहून लाल परीचं निवास उदास हसलं
स्थानकाबाहेर चे धंदेवाईक दिसले नाहीत
पण भकासलेल्या टपऱ्यांचे ओघळलेले अश्रू नजरेतून सुटले नाहीत
गाव तालुके आणी शहरं यांच्या तील हा दुवा
एकाधिकाराने मिळवूनही शासनाला नकोसा व्हावा?
तेंव्हा देखील उजाडल्या गेली होती फार कुटुंबे
आजही तोच तो खेळ माजुर्ड्यांनी कां करावा
चाकं चालली होती तेंव्हा लाखों ना मिळे भाकरी
उपासल्या जीवांना अचानक कोठे मिळेल चाकरी!
आत्महत्या एका जीवाची शंभरांचा काळ ठरते
रंजल्या चेहऱ्यांवरी मग अश्रू वाचून काय उरते?
एक ऐका दांडग्यांनो महाभारताचे ही हेच झाले
अनर्थाने जे कमविले तेही सारे मातीत गेले
सेवाचारी तो खपूनी कमवितो सगळ्यांच साठी
तुम्ही सुद्धा भाजली ती त्याच्या श्रमाचीच रोटी
हात बरबटलेले तुमचे ईश्वराने पाहिले
घालण्या छापे तुम्हांवर अधिकारी त्याने धाडिले
अश्रूपूरित
कवि'रवि'


रिश्तों की रवायत

ईन्सान को ईन्सान बनाने की जुगत पाई जाये
कोई औरही भगवान की व्यवस्था कराई जाये
युं तो हजारों हो गये पत्थर को तराशने वाले
अब के ईन्सानी फितरत को तराशा जाये
बदलना है अगर इस जमाने का उसूल
जीवन के हर तबके को सुधारा जाये
कोई कहें न कहें कुदरत हिसाब करती हैं
अपनों की भलाई में खुद को भुलाया जाये
के रिश्ते होते हैं निभाने के लिए 'रवि'
रिश्तों की गांठ में पेंच पड़ने न दिया जाये
कवि 'रवि'

Thursday, 14 April 2022

एक अनछुई आशा

उनके नन्हे कदम ऐसे चलते रहे
देखकर अपने अरमान मचलते रहे
एकही आरजू ......युंही फुलो फलो
नई मंजिलें .....करलो हासिल चलो
देश की, राष्ट्र की अगली पीढी हो तुम
सुगमतर वो कल के ...शिल्पी हो तुम
पढ़ो और बढो......... ज्ञान दानी बनो
जहां शांति से क्रांति हो ऐसी वाणी सुनो
हमारी उमंगे.............जो खोयी रहीं
चलो आज से..... उनकी आशा बनो
हमें ज्ञात हैं ........राष्ट्र हैं उच्च अपना
अपने कलापों से इस जग की भाषा बनो
कवि'रवि'

शियासी रोटी और हमारा लक्ष्य

कोई सेंक रहा है अपनी रोटी,
शहीदों की चिता पर
                  कोई बहाता है झुठे आंसू 
                  जाति पाती की खता पर
स्वर्ग सिधार गये वे सारे
जो सपना संजोये थे
इंसान में भाईचारे का
                 छोड गये है वसियत में
                 हाथ सर पे...  चोरोंका
अब जहाँ 
हम जागे है गहरी निंद से
हौसला बनाएं रखना है 
पुरी जिद से
                जियेंगे अभिमान से
                जिलाऍंगे शानसे
इस धरा का हर जीव
अब जीएगा एक ही आन से
               मैं हूं इस धरा का
               ये धरा मेरी हैं
इरादें हम सबके नेक हैं
ना कोई हेराफेरी हैं
               रोशन है 'रवि' आसमां
               आस्था के किरणों से
अब मानवता ही बहेगी
दिलों के झरनों से....... दिलों के झरनों से
कवि'रवि'

Tuesday, 12 April 2022

आणि हे सगळं अवचित घडतं

कां ठाऊक नाही पण
 नेहमी असं होत जातं, 
स्वप्न पडतात पण तुटून जातात.     
विचारांना ध्येयात 
परिवर्तित करता करता, 
विचारच अचानक बदलून जातात.   
ती दृश्ये जी समजूतीला 
विश्वासात परिवर्तित करतात, 
काळाच्या ओघात कुठे वाहून जातात. आपल्या मनस्वी पणाचा 
कां कोणी विषाद करावा, 
इतरही अनेक प्रथितयश भटकून जातात. 'रवि' एक यकश्चित ओळख आहे तुझी, 
मोठी प्रस्थ देखील येथे दडून जातात. कवि'रवि'🙏

ना जाने क्यों

ना जाने क्यों अक्सर ऐसा होता है
सपने तो आते हैं मगर टूट ही जाते हैं
इरादों को मंज़िल में तब्दील करते करते
इरादें ही यकायक बदल जातें हैं
वो मंज़र जो ऐतमाद को पुरसुकून बनाते हैं
वक्त की मार से कैसे फनां हो जाते हैं
अपनी आवारगी का क्यों करें गिला कोई
और भी कई सुलझे इन्सान बदल जाते हैं
'रवि' एक अदनीसी अबादत है तेरी
बडे नामचीन भी यहां गुमशुदा हो जाते हैं
कवि'रवि'

Monday, 11 April 2022

माझी सावली

माझीच सावली माझ्यासवे
खेळते विचित्र खेळ 
प्रश्न उलगडता उलगडता 
सम्पून जाई वेळ 
तीव्र उन्हांत संकोचते 
मावळतीला स्वैर 
रात्रीस पांघरुणात माझ्या 
दडते नि:संकोच 
युद्ध प्रसंगी तीही करते 
शत्रूशी डावपेच 
किती धावलो तरी ना थकते 
मी अडखळलो त्वां ती रडते 
अखंड साथी माझी साऊली 
अकल्पित तरी मला भावली 
कवि'रवि'

Saturday, 9 April 2022

अथ श्रीरामार्पण

मर्यादा पुरुषोत्तम ठरण्यासाठी ज्याला जन्मही ऐन दुपारी उन्हात घ्यावा लागला. प्रभुपद प्राप्त करण्यासाठी ज्याने दुसऱ्यांची दुःखे अंगिकारलीत व स्वयेचि कष्टला. चक्रवर्ती सम्राट असूनही ज्याला वियोगातच आयुष्य कंठावे लागले. मानवी समाजाला अत्युच्च दर्जाची शिकवण दिली, अशा दशरथ पुत्र राजा श्री रामाला अहोरात्र स्मरण करावे, त्यांच्या आदर्शमय चरित्राला क्षणभर देखील विसरू नये म्हणून सतत घोष करावा "जय श्रीराम जय श्रीराम जय जय जय जय जय श्रीराम".
श्रीराम नवमी अर्थात प्रभु श्रीरामाच्या जन्म दिनी आपण अधिकच उत्कटतेने त्यांचं स्मरण करून जन्माचा सोहळा संपन्न करूयात. 
🚩🥀🪔🙏🙏🙏🙏🙏🪔🥀🚩
भक्ति प्रार्थी कवि'रवि'

Friday, 8 April 2022

काश के ऐसा होता

इल्तेजा
उनके आंसू न सही, नज़र की बेचैनी तो देखो
लुटे लुटाये से बेरंग, बदहवास जिस्म तो देखो
क्यों आस बांधे हुए हैं, जरा जानकर तो देखो
अपनों को रौंद कर आये हैं, वो चरण तो देखो
तुम मखमल में लबालब, नंगे हालात तो देखो
कुछ न समझें हो गर, खुद को उनमें तो देखो
जली है बस्तियां, महलों से झांककर तो देखो
दबी हुई उन सांसों को, आजमा कर तो देखो

अंजाम

माना वे बेगैरत है 'रवि', पुकार कर तो देखो
न सुलझेगा मसला, तीर चला कर तो देखो
बेइंतेहा ही सही,जज़्बातों को जगाकर तो देखो
नाकाम हो तरकीब, उनकी हस्ती मिटाकर तो देखो

कवि'रवि'

Thursday, 7 April 2022

चार शेर

मेरी ख़ामोशी मेरे जज़्बातों का किरदार हैं
बदजु़बानी से ज्यादा बेजु़बानी असरदार हैं

कलम मेरी गुमां होता है शमशीर की धार है
एक एक लफ्ज़ जो लिखा मुनाफिकों पे वार है

वतन की राह पर निछावर सारा कारोबार है
नज़र की ताब में आया, उसका जीना दुश्वार है

हम फना होंगे यकीनन फिर भी दर्दे दिले यार है
याद आएंगे जब शहीद हम भी उनमें शुमार है

कवि'रवि'

Tuesday, 5 April 2022

'आंबेडकर' एक चिंतन

श्री रामाच्या नवरात्रात आपण बॅरिस्टर भिमराव आंबेडकर यांच्या विषयी बोलण्याचं ठरवलं हा एक विलक्षण योगायोग आहे. आंबेडकरांचं राजकीय आणि सामाजिक जीवन ह्या बाबतीत बहुतांश वेळा चर्चा केली जाते परंतु त्यांचं तत्वचिंतन ह्या विषयावर शक्यतो कुणी बोलत नाही. आज मी त्यांच्या ह्या पैलूवर प्रकाश टाकणार आहे. 
हे सर्व विदीत आहे की आंबेडकर यांचं प्राथमिक ध्येय हे हिंदुंमधील अस्पृश्य समजल्या जाणाऱ्या समूहाला एकात्म मानवता वादी दृष्टीने समाजातील सर्व घटकांनी स्वीकारावं हेच होतं. आणि त्यासाठी त्यांनी जीवन भर लढा दिला. परंतु दुर्दैवाने त्यांच्या ह्या तळमळीला तत्कालीन समाजधुरिणांनी अपेक्षित सकारात्मक प्रतिसाद दिला नाही. ह्या प्रकाराने खचून न जाता त्यांनी ह्यावर नि:संशय असा तोडगा काढला की त्याला धर्ममार्तंडांकडे तोड नव्हती. त्यांनी आपल्या ज्ञातिबांधवांसभवेत भगवान गौतम बुद्धाचा धम्म अंगिकृत केला. मतितार्थ असा की हिंदुंना आपल्या धर्मातील एक अवतार म्हणून मान्य असलेल्या गौतम बुद्धाचे पाईक झाल्याने आपण मूळ समूहा पासून परावृत्त ही होणार नाही आणि कृतार्थ तेची भावना अस्पृश्यांच्या मनात स्वाभिमान जागवेल. ह्या कृतीतून त्यांचा सर्वांगीण विकास व्हावा हेच त्यांना अपेक्षित होते. 
७२ वर्षांचा कालावधी लोटला आहे आणि आपण त्यांच्या द्रष्टेपणाचं फलित देखील सकारात्मक बघतो आहोत. अस्पृश्य ते दलित आणि सद्यस्थितीत समाजातील इतर घटकांच्या खांद्याला खांदा लावून ही मंडळी राष्ट्र निर्मिती मध्ये सहभागी होत आहेत ही आनंदाची बाब आहे. 
हे सगळं सकारात्मक घडत असताना मात्र काही मंडळी आंबेडकरांच्या मूळ हेतू पासून दूर जाताना बघायला मिळतात. उदाहरणार्थ ते स्वतः ला हिंदुंपासून विभक्त मानतात, एवढेच नाही तर हिंदुंच्या देवतांची, मान्यतांची अवहेलना करतात, तिरस्कार करतात. खेदाने म्हणावे लागते की ह्या स्वार्थी वृत्तीने अशी मंडळी प्रवाहापासून दूर जात आहेत जे आंबेडकरांना कदापि मान्य नाही. ही माणसं साधं जय श्रीराम सुद्धा म्हणणं पाप समजायला लागलीत.
शेवटी इतकेच सांगतो की ज्यांना राम समजला नाही त्यांना बुद्ध समजणार नाही आणि आंबेडकर देखील समजणार नाही. ह्या तीनही चरित्रांमधील एकसूत्रता लक्षात घेईल तो खरा प्रबुद्ध होईल अशी माझी ठाम धारणा आहे. श्रीराम प्रभूंनी दुष्ट प्रवृत्तींचं निर्दालन केलं, भगवान बुद्धाने अहिंसेच्या मार्गाने दुष्ट प्रवृत्ती नष्ट केल्यात आणि आंबेडकरांनी दुष्ट प्रथांचा ऱ्हास व्हावा यासाठी आयुष्याचा यज्ञ केला. 
समाजोन्नती साठी त्यांनी दर्शविलेल्या दिशा मानव समाजाला उन्नती कारक ठरोत येवढं बोलून मी येथेच थांबतो.
जय श्रीराम
कवि 'रवि'

Friday, 1 April 2022

यक्षप्रश्न

काश्मीर की नंदनवन, नंदनवन की काश्मीर?
बालपणापासूनच्या सर्व स्मृति ह्या प्रश्नासोबत जाग्या झाल्या आणि माझ्या मस्तकातील मेंदूला गदगदा हालवायला लागल्या. ज्या इंग्रजी टेक्स्ट बुकातून हा धडा शिकवला गेला ते टेक्स्ट बुक आता काळाआड गेलंय ह्याचं स्मरण झालं अन् नकळत दोन खारावलेले थेंब गालांना ओरबाडून खाली पडले आणि क्षणांत मातीत मिसळून गेले. 
हं...... फार पूर्वी नाही तर साधारण पन्नास एक वर्षे लोटली असतील ह्या वस्तू स्थितीचा अनुभव सगळं जग करीत होते आणि कश्मिरी रहिवासी सुद्धा इतरेजनांना मोठ्या अभिमानाने सांगत असत की पृथ्वी वर जर कोठे स्वर्ग आहे तर तो येथे काश्मीरातच आहे. 
स्वातंत्र्य पूर्व काळात भारतात अनेक राजे रजवाडे अस्तित्वात होते आणि एकसंध भारत अशी भौगोलिक संरचना देखील नव्हती. मोंगली शासकांच्या काळात एकछत्री अंमल कुणाचाच नव्हता आणि अशा परिस्थितीत येथे भारत किंवा हिंदुस्थान ही एक सांस्कृतिक संकल्पना तेवढी ज्ञात होती किंवा मानल्या जायची. पुढे इंग्रजी सत्तेला संपूर्ण भारतभर एकछत्री राज्य स्थापन करण्यात यश प्राप्त झाले आणि त्यातूनच वर्तमान भारतीय संघराज्याला बळकटी मिळाली. त्याही परिस्थितीत काश्मीर हे स्वतंत्र राज्य म्हणून आपलं अस्तित्व राखण्यासाठी प्रयत्नशील होतं, काश्मीर चे राजे हरिसिंग यांनी भारतात विलीन होण्यास नकार दिला होता. परंतु, प्रत्यक्ष स्वातंत्र्य मिळण्यापूर्वी इंग्रजांनी अखंड भारताच्या संकल्पनेला सुरुंग लावून मुसलमानांना त्यांच्या धर्माचा आधार देऊन पाकीस्तानची निर्मिती घडवून आणली. झाले इंग्रज भारत सोडून जाताहेत हे बघून आसुरी मुसलमानी प्रवृत्तिंनी काश्मीरचा घास घ्यायचे ठरविले. कबायलींचे हल्ले यशस्वी होतात हे पाकिस्तानी शासनाने जाणले आणि त्या हल्ल्यांना समर्थन आणि पर्यायाने काश्मीर चा ताबा मिळवता यावा यासाठी छुपी सेना कबायल्यांच्या सोबत काश्मीरात घुसवली. हे लक्षात येताच महाराजा हरीसिंगाला भारतात विलीन होणे आवश्यक वाटले आणि त्या अनुषंगाने भारतीय सैन्याने कबायल्यांचा फडशा पाडत काश्मीरचे भारतात विलीनीकरण घडवून आणले. परंतु येथेही
इंग्रजी सत्तेच्या हातातील कठपुतळ्यांनी इतिहासाची पुनरावृत्ती करीत त्यांचा अनुनय करण्यात धन्यता मानली आणि इंग्रजांनी सुचविलेल्या शिफारशी अमलात आणून काश्मीरचा मोठा भूभाग पाकड्यांना घशात घालण्यासाठी सोडून दिला. मुळातच मुस्लिम बहुल ह्या प्रदेशात पाकिस्तानी कारवायांना प्रतिसाद मिळत गेला आणि हां हां म्हणता येथे पुन्हा एकदा काश्मीरला भारतापासून विभक्त करण्याचे मनसुबे जोर धरू लागले. अकर्मण्यतेची मर्यादा ओलांडत कांग्रेसी सत्तेने काश्मीर मधील मूल निवासी हिंदुंना काश्मीर बाहेर फेकून देण्यात मोलाची कामगिरी बजावली. त्याच वेळी उर्वरित भारतातील जनतेला संभ्रमात ठेवण्यासाठी जातीयवादी प्रचार करीत 'काश्मीरी पंडितांचे पलायन' असा संदर्भ रुजविला. आधीच हाता तोंडाशी गाठ असलेल्या बहुसंख्य भारतीय लोकांनी मग काश्मीरातील हिंदुंच्या संघर्षाला सोयीस्कर रित्या दुर्लक्षित केले आणि काश्मीर मधील आतंकवाद एक नासूर बनून गेली तीन दशके हजारोंच्या कत्तलीस कारणीभूत ठरला आहे. काश्मीर मधील विस्थापितांचं जीवन जगणाऱ्या सुसंस्कृत हिंदुंची परवड गेल्या २०१४ पर्यंत आम्ही मूक दर्शक ह्याच नात्याने बघत होतो. पण विद्यमान पंतप्रधान भाई नरेंद्र मोदी यांनी सत्तेवर आल्यानंतर या विषयाला देशापुढे देशापुढील आव्हान ह्या रुपात उघड केले आणि तेथील अनागोंदी कारभार संपुष्टात आणून स्थितीवर सकारात्मक नियंत्रण मिळविण्यासाठी सखोल प्रयत्न केले. आज काश्मीर चे चित्र बदलताना दिसत आहे आणि मोदीजींच्या महत्प्रयासाने पुढील काही वर्षांत रक्तरंजित काश्मीर पुन्हा एकदा हरित नंदनवन बनणार आहे. कलम ३७० आणि ३५ चे निरस्तीकरण झालेले आहे आणि ह्या पुढे काश्मीर मध्ये सामान्य भारतीयाला शेती पासून ते अन्य उद्योगांपर्यंत कोणताही व्यवसाय करण्याची मुभा प्राप्त झालेली आहे. तेंव्हा बदललेल्या स्थितीचा सदुपयोग करून आपण कर्तव्य भावनेने आणि काश्मीर विषयी एकात्म भाव मनात बाळगून तेथे जास्तीत जास्त प्रमाणात आपले वास्तव्य वाढविण्यावर भर देणे क्रमप्राप्त आहे.
पुन्हा कधी काश्मीर की नंदनवन किंवा नंदनवन की काश्मीर असा प्रश्न मनात उद्भवू न देता काश्मीर हेच नंदनवन हे सत्य पुनर्स्थापित करुयात, चला देवभूमी ला आपल्या कर्तृत्वाने सुशोभित करूयात. 
भारत माता की जय
कवि'रवि'