Tuesday, 29 June 2021

मी जरी जगलो

मी जरी जगलो
जीवन हरले
बेरीज करतां
'मी' पण उरले

शब्द ही छळती
भावनांसी ह्या
नाती गोती ही
काहिच नुरले

अंत असा हा
विद्ध करी मम
गंड मनातील
सारे जिरले

देव देवता 
देव्हाऱ्यात ची
यमा देखता
ज्ञान हे स्फुरले

कवि'रवि'

Monday, 28 June 2021

एक विनंती

मिठ्या मारतां मारतां, भांडणावर आलो
खऱ्या अर्थाने आम्ही मराठी झालो...१
शेकडो वर्षांचा गुलामीचा पाश
शिवरायांनी तोडला....२
स्वराज्याचा सुंदर घास....
आम्हां साऱ्यांना भरवला...३
त्या स्वराज्याला भस्म करण्या
इंग्रज सरसावले.....४
जातीवादाचे विष त्यांनी 
पुन्हा एकदा भिनविले...५
तोडा फोडा राज्य करा
मन्त्र त्यांचा फोफावला...६
भारत धर्म अवघा 
स्वार्थापोटी बाटवला....७
जळून गेली इंग्रजशाही
फुटीरता कांही सम्पली नाही...८
जातिभेदाची विषवल्ली
भीमरावांना पण रुचली नाही...९
ध्येय वेडे रसातळी अन 
संधी साधू सत्तेवरी.....१०
स्वातंत्र्याला समजती जणु की
ताटा मधली पुरण पोळी......११
७०वर्षे झाली तरीही 
संविधान ते नाही प्रभावी.....१२
प्रयत्न करी जो प्रामाणिक तो
चढतो पुढती सुळावरी.......१३
आता तरी हे समाज जनहो
समजा ही कुत्सित खेळी...१४
प्रयत्न जे करिती विखारी 
नकारा तयांना अचूक वेळी...१५
रवींद्र सरदेशमुख (कवि'रवि')

Sunday, 27 June 2021

शाम ढलती है

शाम ढलती है
अखियों की नज़र में..... रात चली आती है
सांवला जिस्म 
जहां को आगोश में भर लेता है, 
सहमा सहमा सा हर पल 
चुपके-चुपके खिसकता रहता है
सहर की ओर, शफक़ की आस में
मैं और मेरी तन्हाई 
संवारने लगते है टूटे सपनों को
मन डरता रहता है कहीं
फिर सहर न हो जाए फिर सहर न हो जाए
कवि'रवि'

Wednesday, 23 June 2021

अप्रकाशित पृष्ठ मी

 अप्रकाशित पृष्ठ मी

माझ्या व्यथा सांगू कुणा

शब्द अंधारात विरले

प्रस्तावना मागू कुणा


लेखणीतून रक्त उतरे

अक्षरे बंबाळली

मथळा लिहिण्यात माझे

हात ही रक्ताळले


ही कथा आहे तमाची

दृष्ये ही अंधारलेली

वाणी वैखरी नि:शब्द तरीही

गोष्ट ही साकारली


अल्प असती सौख्य अनुभव

म्हणुनी ते झुरती बघा

कल्पनेच्या कोंदणी

बघतात त्या उघड्या नभा


मी असा का रात्रवेडा

हाच वेडा प्रश्न आहे

माझिया नशिबी तमाचे

अतर्क्य ते साम्राज्य आहे

कवि 'रवि'

Sunday, 20 June 2021

एक कहानी प्रेम कहानी

घर के एक कोने में पड़ी वो किताबों वाली रैक पर अनायास ही नज़र पड़ी और धक् से मेरा दिल ४० वर्ष पुरानी यादों में पहुंचा। क्या क्या और कितना बयान करूं, वो उम्र का तकाजा था, वो कालेजियन मंज़र, वो मस्तियां, वो अखबारों की सुर्खियां, वो युवा मंचों से उठने वाली जोश भरी दहाडें। रोमांचित करने वाली वो शाम के कट्टे पर की मुलाकातें, हर दिन हर पल जैसा हाथ से फिसल न जाएं इसकी चिंता। राजनीति में होने वाली उथल-पुथल मन मस्तिष्क को झकझोर देती थी। कभी लगता था कूद पड़ूं उस यज्ञ में, अपने अंदर के लाव्हा को बहने दूं बेतरतीब। लेकिन, तभी हमारे सिनियर्स की वो तजुर्बे वाली बात की 'ठहरो'! पहले अपनी शिक्षा पूरी करो, इस देश को अनाड़ी नहीं सुशिक्षित युवा चाहिए, अपने अंदर के लाव्हा को मुहाने पर ही रोकने में सक्षम हुआ करती थी। 
वैसे तो अपना दिमाग पैलवान किस्म का था और ज्यादातर ध्यान केंद्रित रहता था शरीर कमाने में, तो वाजिब है कि किताबों से दोस्ती थोडी कम ही हुआ करती थी। लेकिन एक दौर ऐसा भी आया, वो एक दिन अचानक से कालेज में फर्स्ट पिरियड से पहले ही क्लास में घुसते घुसते मुझे बोली "एक प्रश्न का उत्तर चाहिए' दोगे? मैं जो किसी कन्या को देखने में ही झेंप जाता था, अकस्मात यह मोहक आवाज से और उसका रुख मेरी तरफ देख कर चकरा गया। 
मैंने फिर भी धीरज बांधते हुए पूछा ' कौन सा प्रश्न'? 
उसके चेहरे पर की मुस्कान और खिल गई और उसने कहा ' कल परांजपे सर ने जो सिखाया है, क्या उसकी नोट्स दोगे?
प्रश्न सीधा सा था,मगर किसी बमबारी से कम भी नहीं था। मेरे लिए अब उपप्रश्न ये था कि इसे क्या बताऊं। हमारी नोटबुक्स तो केवल इस वजह से पहचानी जा सकती थीं कि उनपर बनाने वाले ने छाप कर रखा था "नोटबुक"। वरना न हमने कभी उसके पन्ने खराब करने का गुनाह किया था न कभी व्याख्याता, प्राध्यापक ने ही हिम्मत करी थी कि हमसे कुछ पूछें। इस उधेड़बुन में क्लास के दरवाजे पर मैं निस्तब्ध सा खडा था और पीछे सभी स्टुडेंट्स आ कर रास्ता मिलने की अपेक्षा में आ खडे थे। तब जो हुआ सो हुआ, लेकिन दूसरे दिन कालेज में हवा फैल गई कि मुझमें और उसमें कुछ कुछ चल रहा है। कालेज में एंट्री करते बराबर देखा कि हर कोई विशेष हाय बाय कर रहा है। जिस की कतई उम्मीद नहीं हुआ करती थी, वो आज हो रहा था। हमारी सिनियर लेक्चरर मैडम ने भी मेरी तरफ विलक्षण नज़र से देखा तब तो मैं पूरी तरह घबरा गया कि आखिर आज यह सब है क्या।
आज फिर से ठीक उसी तरह उसका वही प्रश्न कानों पर पडा और मैं सर्द हो गया। उसकी वो ज़ालिम नज़र मानो तीर सी चुभ रही थी, और मुझे और भी घायल कर रही थी। लेकिन मैंने अपने पैलवान दिमाग को ललकारते हुए बजाया कि नहीं इस तरह तुम्हें कोई चितपट नहीं कर सकता। उधार कि मुस्कान चेहरे पर लाते हुए मैंने कहा, 'हाय'! नहीं मैं अक्सर नोटबुक में कुछ लिखकर रखने में विश्वास नहीं रखता! मैं जो कुछ भी है 'बाय हार्ट' करता हूं।
मुझे लगा मैंने बाजी मारी लेकिन नहीं, तभी उसने मुझे कहा 'शाम को मिलें'! 
रंग उड़े चेहरे से मैंने पूछा किसलिए? तो उसने नया तीर दागा ' आपके इस हार्ट की सर्जरी कर के मुझे नोट्स निकालनी है'। बाहर क्लास के सभी लड़के लड़कियां "फुल्ल मज़े में" मेरा रंग उडता देख कर। मैंने फिर हिम्मत बांधी और कहा मेरा शाम का वक्त वर्जिश का होता है और मैं जिम में रहता हूं। मुझे लगा अब तो मैंने उसे बोल्ड कर दिया है, लेकिन वो भी क्या बेखौफ कि कह गयी चलो तब जिम में ही मिलते हैं।
असमंजस में पडा मैं कुछ तरकीब ढूंढ रहा था कि उसने कहा 'रहने दो मैं तो मजाक कर रही थी। तब तक क्लास के बाहर मेरी अच्छी खासी क्लास चल रही थी जीसका बाकी स्टुडेंट्स मजा ले रहे थे। मैं कालेज भर में रौब जमाते घूमने वाला आज सबके लिए एक बच्चा बना मुझे लगा। मैंने सीधा कालेज के बाहर का रास्ता पकड़ा और बीना कहीं रुके सीधा घर पर पहुंच गया।
उस दिन न तो खाने में मन था न और कुछ करने में। मेरी इतनी बुरी हालत पहले कभी नहीं हुई थी, बल्कि मुझसे बात करने के लिए बच्चे लोगों को सोचना पड़ता था। दिन किसी तरह गुजरा रात भी उथल-पुथल में बीती।
सुबह जब फिर से कालेज जाने का समय आया तो दिल कचोटने लगा, पर एक अंजान सी ललक मुझे कालेज के अहाते तक खींच लाई। मैं ग्रांउड तक पहुंचा और लॉन पर किसी तरह टिक गया। मेरा दिल पता नहीं कुछ सोच रहा था भी या नहीं, लेकिन मुझे अहसास किसी बात का न था। 
पता नहीं कितना समय बीता, पास में एक आहट सी महसूस हुई। मैंने नज़र उठाकर देखा तो मेरे करीब वो भी बैठी मुझे ही अनथक देख रही थी। मैं उस पर गुस्सा करूं या और क्या करूं यह सोच ही रहा था कि उसी के मुख से चंद शब्द मुझपर आ धमके। उसने कहा, देखो इतना असहज हो कर मुझे घूरने की जरूरत नहीं। मैं जानती हूं तुम्हारी मर्यादा, और मैं चाहती भी नहीं कि तुम कोई सफाई दो। दरअसल मैंने पहल की है तो मुझे ही मामला सुलझाने दो। मैं बस सुन रहा था, उसने आगे कहा, देखो इतना बड़ा कालेज है, इतने सारे स्टुडेंट्स है, मैं तुम्हारी कालेज में किस प्रकार की शोहरत है यह सब जानती हूं। उसके बाद भी तुम्हारी ओर आगे बढ़ कर आई हूं, क्या इस का कोई मतलब नहीं बनता तुम्हारी नज़र में।
इतना कहकर वो मेरी तरफ देखने लगी मेरे जवाब की चाह में। थोडा समय यूं ही सन्नाटे में निकल गया, लेकिन वो भांप गई कि मैं भूमिका बांधने में लगा हुआ हूं। बडे संयम से लेकिन निश्चित मन से वो बैठी हुई थी।
मैंने फिर पोजीशन बनाई, उसकी तरफ देखा और कहा 'देखो! मैं कालेज में एक विशिष्ट किरदार निभाता हूं जिसकी हर कालेज में जरूरत होती है, ताकि स्टुडेंट्स में एक डिसिप्लिन कायम रहे। और मैं वो भली-भांति निभाता आया हूं। तुम्हारी इस अचानक एंट्री ने मुझे झकझोर कर रख दिया है, और मैं अपना स्व नियंत्रण खो रहा हूं, कश्मकश में पड़ गया हूं कि तुम्हें क्या कहूं। 
पल भर का सन्नाटा! फिर उसने कहा देखो ऐसा नहीं की अचानक मैं तुमसे आ धमकी हूं। हम दोनों को एक अर्सा हुआ है इस कालेज में। हम दोनों एक साथ ही यहां दाखिल हुए, तुम्हें तब से चाहती हूं। जब तुम कालेज की गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे, आगे बढ़ कर स्टुडेंट्स की आवाज बनने का प्रयास करने लगे, तब थोडा अजब सा विचार मन में आता था। क्या यह लडका वाकई पहचान बढ़ाने के लायक है? तब और भी तुम्हें जानने की मन्शा जागृत होती थी। अक्सर उस समय मन में टीस उठती थी जब कोई और लड़की की बातों में तुम्हारा जिक्र आता था। इस अवस्था से उबरने का कोई रास्ता दिख नहीं रहा था और दिल दिमाग दोनों तुम्हें साथ पाने का आग्रह कर रहे थे। तो मैंने यह तरकीब ढूंढ निकाली और तुम्हें मुझसे वार्ता करने को आकर्षित किया। लेकिन तभी ये जान गई कि पैलवान तो तुम लगते हो मगर दिल से कमजोर हो तो आज मैंने सोच लिया कि तुम्हें ज्यादा उलझन में ना रखा जाय। सो यहां चली आई हूं, अब तुम्हें उत्तर देना है कि क्या तुम मुझे चाहने लगे हो? 
न न! कोई औपचारिकता की जरूरत नहीं है, बस तुम आज के लिए हां या ना इतना कह सकते हो। मुझे जल्दी नहीं लेकिन कालेज में तुम्हारी कहानी गूंजने लगी है और उसका सीधा असर तुम्हारी छबी पर पड़ेगा यह जानकर मैं इसका निर्णय करना चाहती हूं।
करीब १५ मिनट हम दोनों निश्चल बैठे रहें। कालेज में मटरगश्ती करने वाले लड़के लड़कियां जान बूझकर इधर उधर घूमते हुए ताका झांकी में लगे हुए थे। झेंपते हुए मैंने उससे कहा 'हमें यहां से जाना चाहिए'। उसने मेरी तरफ कटाक्ष करते हुए कहा 'हां या ना'।
मैं फिर कुछ कह न पाया, उसने कहा ठीक है, तब हम यहीं पूर्ण विराम देते हैं और अब के बाद हम फिर नहीं मिलेंगे। कहकर वो निश्चय से उठी और जाने के लिए बढी थी कि मेरी जुबान से एक आर्त आवाज निकली "आय लव यू"।
उसने झटके से मेरी तरफ देखा, मैं लॉन की तरफ देख रहा था। वो फिर से मेरे पास आ बैठी, मुस्कुरा रही थी, हिम्मत जुटा कर मैंने आंख उठाकर उसे देखा। कुछ निर्णायक भाव से उसने मुझसे कहा ' हां ठीक है, अब इसी जगह हम मिलते रहेंगे मगर क्लास बंक करके नहीं। और हां, बहुत समय है हमारे पास आगे जीवन में। तो अपना करियर और ऐक्टिविटी को दरकिनार नहीं करना है। कहकर वो चली गई। मेरा शरीर मानो वज़न रहित सा कुछ देर वहीं पड़ा रहा। दूर से मुझे निहारने वाले मेरे मित्र आखिर मेरे पास आकर असमंजस में पूछने लगे 'भाई आखिर हुआ क्या, क्या वो तुमसे नाराज़ हो कर चली गई, या तुमने उसे ना कह दिया? उनकी नकारात्मक बातें सुनकर मैं तडाक से बोल पडा 'अरे नलायकों वो मुझे हथिया कर चली गई' मेरे दिल दिमाग पर उसनेे खुद का सिक्का जमा दिया है। वो मेरी हो गई है।
फिर क्या था पूरे कालेज में उस दिन बस एक ही बात चल रही थी "मैं और मेरी प्रेमिका"
किसे पता था इज़हारे मुहब्बत इतना आसान होगा। ज़मीं पर रहूंगा मैं और छोटा आसमान होगा।
कवि'रवि'

Wednesday, 16 June 2021

रहमत का नज़ारा

खुशियों के चार पल 
हिरासत में दे दिए
ऑंसू उधार मांगे थे
विरासत में दे दिए
तेरी रहमत का असर
अक़सर अजबसार है
बेवक्त की बरसात है
पतझड़ में खुमॉंर है
कवि'रवि'

Tuesday, 15 June 2021

तड़प

कुछ भी नहीं बचा है, 
लो, अब खून ही पी लो । 
मजे से जीते आये हो, 
कुछ और भी जी लो ॥
मरता है किसान ? 
मरने दो, 
जलते है मकान 
जलने दो। 
आबाद है जब तक 
तुम्हारा जहान, 
तुम जींदगी के मजे ले लो ॥
सङ्‌क के उसपार 
तोड़ो वो झुग्गियाँ, 
बदलो वो दुनिया। 
वहाँ भी छुपा है 
तुम्हारे ऐश का सामान,
 लूटकर ले लेलो
सत्तर सालों बाद अब 
बूढी हो चली है आजादी। 
उसकी हस्ती का अब 
यहाँ क्या काम, 
उसे दफनाकर मिटा डालो
कहानियों में मरे होंगे 
राक्षस उस ज़माने के 
इन सदीयों के मायावी हो तुम, 
करो कत्ले आम और वाहवाही लो
अगर जरा भी बची है 
इन्सानियत तुम्हारे जेहन में । 
मरने से पहले कुछ ऐसा भी कर लो
मरतों का सलाम ले लो
कवि'रवि'

इन्तज़ार

आखरी लम्हों में इकबार जी लूँ 
जी लेने दो | 
होठों से नहीं, इक बार आँखों से पी लूँ 
पी लेने दो ॥
तेरे दर की दहलीज भी तंग नजर, 
पार करने को करूँ ठुकराती है।
दरीचे से ही करूँ तेरे दीदार,
कर लेने दो
मेरी हस्ती में मुझे तू नज़र आता है
खुद को तडपाता हरबार । 
तेरे हिस्से की मार मैं खा लूं 
खा लेने दो ॥
दीन को रात में तब्दील कर
करूँ शाम से सहर का इंतजार, 
मुझको भाती है सन्नारों की पुकार, 
सुन लूँ सुन लेने दो
कवि 'रवि'

एहसास ए अजायब

तेरे शहर की हवा 
कुछ अजीब सी है,
यहाँ हर मर्ज़ की दवा 
कुछ अजीब सी है
मस्ती में झूमते यहाँ लोग 
उलझे उलझे से, 
सिसकियाँ लेने की अदा 
कुछ अजीब सी है।
छटपटाते भी है मगर 
गुमसुम गुमसुम, 
इज़हार ओ इऩकार एकसाथ 
खता अजीब सी है।
आगोश में समेटते हैं हर रोज़ 
नयी मंजिलों को, 
खामोश चेहरों की सदा 
अजीब सी है। 
मैने भी देखा है तेरे शहर को 
अनदेखा था,
मुझमें कहाँ से आयी है बता 
ये बात अजीब सी है।
कवि'रवि'


दिल की कशिश

इक दूसरे की खुशी और ग़म में 
कौन यहाँ शामिल होता है।
 देने तसल्ली हर इक पल में, 
अपना ही वो दिल होता है। 
ख्वाब सजाकर राह पे चलते 
मेरा हौसला ही है साथी 
थकने पर भी साथ ना छोड़े, 
अपना ही वो दिल होता है। 
मेरे संग चलने पर अक्सर 
दर्द ही पाये है उसने
टुटने पर भी आस बँधाए 
अपना ही वो दिल होता हो
कवि'रवि'

भान

कां असाव्या भिंती, जर हे विश्वची माझे घर"। धर्म तरी कां अनेक, जर हे एकची अपुले घर।
विज्ञानाची कास धरोनी सर्व चालले पुढे, चाली रुढींना तरीही संगती को धरावे बरं ॥
क्रीडा, शिक्षण, आणिक तंत्र हेची नवे मंत्र
साधु, मुल्ला, पादऱ्यांना ही का नमावे बरं ॥
चला गड्यांनो आतां असावी एकची अपुली आस 
पर्यावरणा सुदृढ करुनी पृथ्वी करुया खास !!
यांत्रिक सोई जरी वापरू तरी ठेवू मनासी जाण 
पृथ्वी वरल्या सर्व जिवांचा करू आम्ही सन्मान !
कवि'रवि'

Monday, 14 June 2021

जिद्द

आयुष्याची वाट लागली 
तरिही स्वार तो स्वप्नांवरती . 
मुखी विळसते हास्य जरी का 
हजार जखमा अंगावरती
जगू जगू म्हणताना 
तो तर मरतो आहे दिन प्रतीदिन 
मरता मरता करतो आहे 
धडपड तो ती सर्वांगीण
ध्येय म्हणावे याला की मग 
असे मनाचे वेडची हे 
ध्यास साधणे" इप्सित" 
प्राप्य तयाचे एकची हे
वज्र जाहले डोळे 
पापण्यांतही अश्रू नसे 
अंधाराची साथ तरी पण
मार्ग तयाला स्पष्ट दिसे
कवि'रवि'

शब्द रूपे

शब्द माझे धाव घेतात 
अंतरातून अंतराळाकडे | 
आसमंत हा पिंजून येतात,
अंतराळातून अंतराकडे 
शब्दांनाही जपावे लागते
शब्द ही जख्मी होतात 
हळूवारपणे फिरविला जर हात
शब्द प्रेम लावून जातात
शब्द जातात? होय! 
शब्द हे जाण्यासाठीच असतात
अंतरातून अंतराकडे 
शब्दाची देवाण घेवाण करताना 
शब्दांचेच साकडे
निःशब्द राहूनही कधीतरी 
बोलता येते शब्दांची भाषा
म्हणूनच मग त्यावेळी वाजतात
नेत्र पल्लवींचे चौघडे 
कधी शब्द होतात सैर भैर
अन सोडतात फूंकार 
भले भले चारित्र्यवान 
मग पडतात नागडे उघडे
कवि'रवि'

शब्द शक्ति

शब्द हे संहारक अस्त्र
शब्द ची हो भावना
शब्दावीण अन्य दुजा
मार्ग नसे हो यामना 
शब्द जपावे, शब्द विखुरावे 
शब्दांनीच हे विश्व साकार 
शब्दांना घेऊ दे नित्य
मंगलमय आकार
एक शब्द शेवटी तुला हा 
सांगावासा मनी असे
शब्द मनीचा मनी घरला तर 
संग तुझ्या रे कुणी न दिसे
ह्यास्तव उधृत कर शब्दांना
आणि सिद्ध हो शब्दां सम
 प्रेम असू दे शब्दां वरती 
पंचप्राण अन तत्वासम
कवि 'रवि'

लोकल ची गंमत

ती म्हणाली त्याला 
नऊ पस्तीसच्या लोकल ला 
चल गर्दीत शिरू अन मजा करू 
तो म्हणाला नको 
नको नको ते मुळीच नको 
जे द्यावे तू मजला केवळ 
सर्वांवरी से उधळू नको
कवि'रवि'

अर्चना

शब्दांच्या लाटांवर होऊनी स्वार 
सखे चल धुंद होऊया
शब्द सागरातून मंथुनी 
शब्द रत्न ले भरुनी आणुया
मधुगंधा सम मज मस्त करुनी 
हे शब्द धावती पुढे पुढे 
भ्रसरा सम भी अत्र तत्र 
धावतो तयांच्या धुंदी कड़े 
देतात मजसी ते स्फूर्ति, शक्ति
अन देती अवसान 
सत्य सांगतो सखे तुजसी मी 
उर्मि गीतांची तुझ्याकडे 
जोवरी देशील साद तोवरी 
फुलतील माझी शब्द फुले
तुझ्याविना तर अक्षर दुर्लभ
शब्द मागू मी कुणाकडे
कवि'रवि'

इश्क नासूर

खुले दरीचे से 
उसकी एक झलक ही नजर आई
खुदा गवाह है मेरी जान निकल गई पलके झपकाते हुये मिलाई जब उसने नजर  
जेहन के कफ़स से मेरी रूह निकल गई 
लोग कहते हे बंद दरीचों से भी सदा आती है उम्र बालीग हो तो 
दिल चुराने की अदा आती है 
जब उसके रुक्सार का होता है दीदार
प्यार के नग़मे लबों पे होते हैं सवार गुनगुनाता हुआ मैं फिरुं गली कूचों में 
उसके गेसूंओं की महक ले के हवा आती है मुहब्बत कर न ले 
मुझ जैसा नादान न बन 
टूट जाता है दिल जब भी
दुवा न दवा काम आती है।
कवि'रवि'

ये ना एकदा

नव नयनांची शस्त्रे 
माझे छेदन करुनी जाती 
कुठेतरी पण जखमा 
मजला सुख देवोनी जाती
कां लागे हुर हुर अखंडीत
 जरी तू कधी ना दिसशी 
केवळ तव नयनांची धडपड 
आठवते गे  मजसी 
पुन्हा एकदा आणि पुन्हा 
तू वळुनी बघ ना जरा 
शब्दाविणही कळेल तुज मी
तुझाच मैतर खरा
येशील जरी का जिवनी माझ्या
विश्वची वाहीन तुला
विद्ध माझिया त्या नयनांनी 
बघतची राहिन तुला
कवि 'रवि'

स्मृती आणि क्लेश

छेडीत तार असतां
सूर वेदनाची झाले 
आर्त नादासवे
 मन भरकटून गेले 
हळूवार कां फुलाव्या
जखमा जुन्या मनींच्या
कां अश्रूही असे मज 
अर्ध्यात सोडूनी गेले 
मृदगंध सोडूनी कां
 आभाळ ते विसावे
 तरी बंध रेशमाचे 
कां ते तुटोनी गेले
या पाकळ्या उगा कां
स्मरतात त्या स्मृतींना 
आनंद जीवनाचे सारे विरुन गेले कवि'रवि'

परछाई

मेरी परछाई मेरा साथ दे 
ऐ तऩहाई मुझे हाथ दे
खामोश नज़ारों आवाज़ दो
डुबती मंज़िलों नया आगाज़ दो
नाकामी परवान चढ़ा दे
बदनामी बस नाम बड़ा दे
थमते दिल तू धडकन भर दे
बेजान जिस्म़ दे जान अगर दे
प्यार मोहब्बत गिले और शिकवे 
जीने का सामान जो भरदे 
मैं भी पल जी हूँ लेना चाहूँ 
नज़रे अदा से ध्यान इधर दे
नज़रे अदा से ध्यान इधर दे
कवि 'रवि'

विनवणी

निः शब्द कां मन आज हे
माझ्या व्यथा सांगू कुणां
हल्केच कां तू मिटविल्या 
मम आठवांच्या त्या खुणा
येताच त्या वळणावरी 
पाऊल अजूनी अडखळे
वळणावरी वाटाच तुटल्या 
वेड्या मनाला ना कळे
कोमलांगी तू तरीही 
मन तुझे इतके कठोर
लू जरी कां लुप्त झाली 
करीतो प्रतिक्षा हा चकोर
ये पुन्हा ये एकदा 
ये एक क्षण भेटावया
माझिया थडग्यावरी पाकळ्या ओतावया
कवि'रवि'

हसीना

लबों पर उभरते से वो लफ्ज़
एक कहानी सुना जातें हैं
तीखी नज़रों की कटारें
दीवाना बना जाती है
वो गेसूं रक्स करते हुए
चॉंद को ओझल कर जाते हैं
तेरे चेहरे पे न शिकऩ कोई
इधर जान पे बन आती हैं
कवि'रवि'

मेरे लबों पे को आरसी लफ्नो की मुझे एक कहानी सुना जाते हैं वो करे भाइयोंकी को तीखी कटारें नजरों की

दीवाना बना जाती है.

वो गूँसूं क्स करते हुये वो बोलू चाँद को ओझल कर जाते हैं तेरे वे चेहरे पे न शिकन कोई इधर जान पे बन कर हैं आती है

कुणा काय द्यावे..

कुणा काय द्यावे, मला ते कळेना
कसे धन्य व्हावे , मला ते कळेना
जगी सर्व कांही भ्रमाचे तमाचे
कसें साचवावे, मला ते कळेना
जरी दृष्टी माझी सदा शोधिताहे
कुणा स्वीकृती दे मला ते कळेना
असे रोज चिंता नसे भान कांही
कसे ध्येय पावे मला ते कळेना
करू साधना की स्मरू त्या नियंत्या
धरू पाय त्याचे मला ते कळेना
कवि 'रवि'

Sunday, 13 June 2021

इशरते अहबाव

ख्वाबों में आते रहना

सितारोंमे दिखते रहना

चाॅंद सी रोशनी मुझपर

यूँ ही बरसाते रहना

यारों के बिन जीना गँवारा नहीं

तुम से बिछड़के भी यारों
मैं कभी हारा नहीं
हारा नहीं हूं क्यों कि

हरपल हो, तुम्, मेरे साथ

दूरसे से भी देखता हूं मैं 
दुआ करते वो तुम्हारे हाथ
कवि'रवि'

हौसला मेरा

गर मुझमें हो अरमाँ

तो भला क्या कम है

ग़म ही को साथी बनाया है

तो फिर क्या ग़म है है

आंधी ओ तूफान तू

क्या बिगाडेगा मेरा 
बुलंद हो इरादें
तो कयामत भी नम है
कवि'रवि'

अर्थ

काल जे डोक्यावरी

आजचे निर्माल्य झाले

बघूनिया त्या वास्तवाला

रे मला सारे कळाले
कवि 'रवि'

तफावत

वाटेवरचा आंधळा, 
ओरडून ओरडून भीक मागतोय 
मस्तीवाला धनदांडगा 
गाडीमधूनी भुर्र पळतोय 
दैव दिले जर देवाने, 
तर दैवाचा हा खेळ कसा 
शेर (स्वतः ला) समजुनी गुंड मवाली, 
गरीब जनांचे शिर फोडतोय 
डोंबाऱ्याची कसरत बघुनी, 
बघा बघे टाकिती टाळ्या 
पैसे द्या हो ! हात पुढे जव, 
एकेकची तो पाय काढतोय 
ज्या रक्ताच थेंबही झिजतो 
तुमच्या अमुच्या सेवेला
 मोबदला देण्यास्तव कां पण 
हात खिशाशी हा अडतोय 
बघता बघता सारे जग हे 
स्वार्थाने की बरबटले
 पैशासाठी अधम हो एक तो
 माय बहिणीला ही विकतोय
अरे नियंत्या तुझीच सारी 
तूच तयांना जन्मविले 
ऐसे असूनी परस्परां स्तव 
भेदभाव तू कां करतोय
कवि'रवि'

याचना

माझिया हृदयातुनी गं 
तू कधी जाऊ नको
आंधळ्या विश्वात माझ्या 
तू भले... राहू नको 
मोड ती सारीच वचने
जी दिली होती मला
भूतकाळीच्या दिसांना 
पुन्हा कधी पाहू नको 
कानी येता साद माझी 
अधीर तू होऊ नको
भंगलेल्या त्या सुरांना
 पुन्हा कधी गाऊ नको
भेट चुकुनी जाहली जर 
अश्रुमय नको
विखुरल्या वाटेकडे गं 
तू कधी धावू नको
मी तुला पाहीन जरिही
तू तसे दावूं नको
फाटक्या नेत्रांत माझ्या 
पुन्हा कधी मावू नको
कवि'रवि'

ख़ामोशी

अबके जब हम
वक्त की रफ्तार से निजात पाते है
अक्सर तेरे वे शिकवे गिले याद आते हैं
ता उम्र नहीं ला सके फुर्सत के दो पल, 
मज़हार में वो गुजरे ज़मानें याद आते हैं
हे ईश्वर
मुझे जन्नत न अदा कर 
उनके अरमानों के वो फसाने याद आते है
कवि'रवि'

साकी..... साकी

शाम जब ढल़ के रात होती है 
हमें तो रिदंगी याद आती है 
बड़ी दिलकश़ अदा है तुझमें साकी 
तेरे आते ही नशा आबाद होती है 
न जाने कैसा समाँ बंध जाता है 
सूकून चैनो अमन की बरसात होती है
तेरे नाम से साकी 
जुडा है हर एक मैकश 
जो शराबों में नही 
वो तुझमें बात होती है

ना फऱमानी

मौत 
तेरे आने से चेहरे पे नूर आया है
तेरी आहट की सदा पाकर 
जेहन में सुरूर आया है
तेरे साथ मेरे लिये 
पै़गामे जन्नत जरूर आया है
मुझको मेरी हस्ती पर 
इसलिये इतना गुरुर आया है
आ चल मुझे ले चल 
तेरे आगोश मे छुपाये हुए
जन्नत भी देखें
आज मुझ जैसा कोई 
मगरूर आया है
कवि'रवि'

अनुबंध

कल्पना तुझिया मनातील 
कां थांबल्या ओठांवरी 
सांग ना मनीचे.... तुझ्या गं
कां अशी तू बावरी
ओळखावे मीच सारे 
कां धरावा ध्यास तू 
ओळखूनी मी तरी तू
मग अचानक गप्प व्हावे 
खेळ हा खेवू किती 
मजला आता ना साहवे
स्पष्ट शब्दातून मजला
 प्रेम ते तुझिये हवे 
रोम रोमातून जरिही 
शब्द तो घुमतो कसा 
व्यक्त तू केल्याविना 
मी सांग तो उचलू कसा 
माझे असे जे सर्वकाही 
देईन मी ओसंडूनी 
ना तरी मागेन कांही 
वचन घे हे मांडूनी 
आज तू मजल पुसावे 
आणि मी होकार द्यावा 
नेत्रां चिया क्या मैफिलीचा
 हा असा अनुबंध व्हावा 
सांगना करशील का 
इतुकेची तू धैर्यासवे
आतूर मी येण्यास गं 
सर्वोपरी तुझियासवे
कवि 'रवि'

कृतज्ञता

कुणी कधी अन कसे कुणास्तव,
काय करील कळत नाही 
कार्य करुनही कष्ट कुणाचे 
कसे कुणाला कळत नाही
कृतज्ञतेस्तव कसे कुणाला
काय म्हणावे कळत नाही
करीता करीता किती कुणी
कोणास द्यावे....माप नाही
करण्याऱ्याने करीत रहावे 
कृतीस त्याच्या काप नाही
हात पसरूनी घेतो जो तो
देणे घेणे शाप नाही
लुटावयासी वृत्ती पाहिजे
क्षुद्र मनाची टाप नाही
कवि'रवि'

चेहऱ्यांची जत्रा

येथे माणसे फक्त चेहरे होतात. 
तांबडे, लांबट, काळे, गोरे
असंख्य आकारांचे चेहरेच चेहरे
चुंबका प्रमाणे 
एकमेकांस घट्ट चिकटलेले तरीही
चुंबकाच्या न्यायाने 
एकमेकांपासून परावृत चेहरे
चेहरे हासतात ही कधीतही
ओळखीचे ते स्मितहास्य
रोज ठराविक साथ करतात
तरिही अलीप्त हे चेहरे
एखादा चेहरा 
दिसला नाही एक दिवस 
आजू बाजूस त्याचा शोध घेतात चहेरे
दुसऱ्या दिवशी मूकपणाने 
प्रश्न टाकतात हे चेहरे 
शब्दाशिवाय ही सारे काही 
बोलत असतात हे चेहरे
अगणित काळचं गणितीय फळ 
आहेत हे चेहरे
मला काय त्याचे असा भाव घेऊन जगताहेतच जगताहेत हे चेहरे
चेहरेच चेहरे चेहरेच चेहरे
कवि'रवि'

अश्वत्थाम्या थांब

अश्वत्थाम्या थांब
असा भटकू नकोस 
या सृष्टीला अंत नाही, 
आणि,
तुझ्या शापित जीवनालाही अंत नाही 
अंत नाही म्हणून कां कुणी
जिवाची वणवण करावी ? नाही! नाही!! कदापि नाही
कदापि नाही कारण 
शापित जरी तुझे जीवन तरिही
तू ही जगनियंत्याचांच अंश 
तुला अमर ठेवण्यामागे 
नक्कीच असेल कांही कारण
 कारणा शिवाय जन्म नाही 
कर्तृत्व नाही,
दोष नाही, मृत्यु नाही 
कोण जाणे पुन्हा एकदां 
घडेल येथे
महाभारताचे राजकारण 
पुन्दा जन्मावे लागतील 
तुझ्या सारखे शूर योद्धे
किंवा, 
कदाचित् सूच होशील सूत्रधार
आणि देशील पृथ्वीच्या गतीचक्राला
नवे रूप नवे आकार
तेव्हा थांब! जरा विसाव अन्
येणाऱ्या काळाची प्रतिक्षा कर 
येणाऱ्या काळाची प्रतिक्षा कर
कवि 'रवि'

Saturday, 12 June 2021

माणूस प्रवृत्ती

असाच कधीतरी विचारांमागे 
धावतो माणूस
आधीच्या गुंतागुतीला आणखी वळणे 
देतो माणूस
विचारांच्या वलयांवर कधी स्वार होऊन 
उंचच उंच शिखरे पार 
करतो माणूस
तर कधी ह्याच वलयांच्या अधीन होऊन
रसातळाला 
जातो माणूस 
माणसाची जातच न्यारी
दऱ्या कपारी झाडे शिखरे 
नद्या सरोवर सागर लहरी
दिवस रात्र संध्येच्या प्रहरी
रंगां मधून उतरवितो माणूस
कधी आतंकित भयगंडाने, 
क्रूरपणे ही जगतो माणूस 
कधी सूर ते स्वर लहरींचे
कधी अचानक मौन वैखरी
स्नेह, द्वेष ही क्षणांत बदली 
स्तब्धांदोलित, शून्य पणाने
क्षण क्षण विरळा असतो माणूस
क्षण क्षण अगम्य असतो माणूस
कवि'रवि'

जूस्तज़ू

कहाँ तेरा जवाँ हुस्न ये नादाँ 
और उसकी वो शबनमी सादगी कहाँ 
वो तुझमें हो सकती है शायद 
बेशक यकीन है मुझे उसमें तू कहाँ अठखेलियाँ करती, शरारतभरी तेरी नजर नजरों से दुआ आदाब बजाती है 
उसकी नजर 
राह चलते तू उड़ाये राहबर का सुकूं
वो चले राह पर हम बजा लाते है सलाम 
रंगे हिना तेरे होठों पे और गाल जैसे गुलाब उसको देखूँ, नजराता है आसमानी शबाब हुस्न वाले और भी होंगे तेरी मानिंद 
खुदाया दुनिया में उसका कोई सानी नहीं 
कुदरत ने तुझे बनाया हे लाजवाब 
उपर से उसमें  पिरोया है माहताब 
तेरी दिलकशी 
मुझमें चाहत जगा जाती है 
पर उसके आगोश में रूहानी 
इबतदाहोती है। 
तुम हो खूबसूरत शायरी 
बनाने वाले की 
वो कुरआनी आयत है समझने वाले की 
ले तुझको भी सलाम और उसको भी सलाम लिखता ही रहूँ 
कभी पूरा न हो मेरा कलाम
 कभी पूरा न हो मेरा काम 
कभी पूरा न हो मेरा कलम
कवि'रवि'

'अ' शिक्षण

काळ, काम आणि वेग 
शाळेत शिकत असताना 
सोडवलीत काम व वेगाची गणिते
काळाचं गणित मला जमलंच नाही
पश्चिमेकडे धावणाऱ्या सूर्याला पाहूनही प्रकाशांचं गम्य 'मला कळलंच नाही
पूर्वेच्या दिशेला झाली वाटचाल  अंधाराशिवाय पदरी कांही पडलंच नाही 
कधी प्रसन्न, स्वच्छंद आनंदी
जगणं वाटयाला आलंच नाही 
स्नेही म्हणती गड्या
काळाला तुझं कांही भावलंच नाही
सत्य पाहता माझ्या मते
काळ कुणाचा नाही, कुणाचाच नाही 
काळाने कुणाशी जमवून घेतलंच नाही
काळाने कुणाशी जमवून घेतलंच नाही
कवि'रवि'

तन्हाई

शिकवे गिले किससे करें....
तुम हो ओझल दूर दूर
नजरें घायल सी होकर .....
तुम्हे खोजती है दूर दूर
आ जाओ इस कदर भी ना....
हमपे सितम ढाओ 
हक है मुझे के लिपटाकर तुम्हे....
ले उड चलूँ इस जहाँ से दूर ॥१॥ 
याद कर के वो दिन वो  रातें.....
दिल और भी तडपता है
चाहत पे मेरी भरोसा कर .....
न जा मुझसे इतनी दूर
जाना ही था, क्यों छेड़ दिया......
दिल के तारों को बरबस
झन्कार गुंजेगी तेरे कानो में .....
चाहे जाओ जितनी दूर
कवि'रवि'

आकाशातील ताऱ्यांनो

आकाशातील ताऱ्यांनो
तुम्ही साक्ष होतात ह्या सृष्टीच्या सृजनाला
आणि साक्ष होतात
येथे जन्मणाऱ्या प्रत्येक जीवाला तुमच्यामधले तेज कदाचित
तुम्ही अर्पण ही केले असेल तेंव्हा 
काय त्यावेळी तुम्ही समजला होतात
येथील सृजनशीलता कधीतरी 
तुमच्या अस्तित्वालाच हात घालेल 
आणि पृथ्वीच्या पार ही कधी
माणसाची जात पोहचेल
पण बघा तुमच्या कर्माचे फळ 
आज तुम्हालाच वेडावतेय
सृजनातून विध्वंसाची भिती
तुम्हालाही भेडसावतेय
होय हे होणारच
विज्ञानाच्या नियमाने होणारच 
आकाशातील ताऱ्यांनो
आतातरी जागे व्हा 
पुन्हा एकदा ह्या सृष्टीला 
पूर्ववत करा, सृष्टीला पूर्ववत करा
कवि 'रवि'

हकीकत

शहर की गलियाँ 
तंग होती गयी 
सिमटते सिमटते बस्तियाँ
सिकुड़के रह गयी
शाहबाज कोई 
और कोई फ़कीर 
शहर में इन्सानियत 
खोके रह गई
क्या तू मुझे
क्या मैं तुझे 
दोस्ती की शहर में 
बुनियाद ढह गई 
गरचे दो अश्क़ भी 
बहा बहा जाता है कोई
शहर में वो मिसाल 
यादगार बन गई 
जुबाँ पे तारीफ़
खलूस में है चोर 
इन वाकयों की शहर को 
आदत सी हो गई
अदना सा मैं 
भला क्या देखूँ 
इन नजारों से आँखे 
दंग रह गई
कवि'रवि'

राष्ट्र गान

उत्तुंग है हिमालय सुखदायी सारी नदियाँ।
हिन्दोस्ताँ पे अपने है नाज़ करती दुनिया ॥
विज्ञान और धरम का यहाँ मेल है सुहाना !
उद्योग और कृषी का सही मोल हमने जाना ||
अभिमान से उठे सर करते हैं कर्म ऐसा।
विद्या, कला, अध्यात्म में
जग में न कोई हम जैसा ॥ 
शस्त्रास्त्र और शास्त्र से
शांति की ही कामना 
शौर्य भी और धैर्य भी हो 
मां भारती! यही मांगना
कवि'रवि'

बाबासाहेब भिमराव

युग प्रवर्तका तुला शत शत प्रणाम 
तुझ्या बुद्ध्योत्कर्षाला शत शत प्रणाम
वैचारिक क्रांतिच्या नभांगणातील 
तूही प्रखर चमकता तारा
अभ्युदयार्थ पिडितांच्या 
तू देह झिजविला सारा
समता, न्याय आणि सहजीवन 
तुझ्या आधुनिक युगाचे मंत्र झाले
पेरलेल्या त्या बिजाला 
बघ आज उत्कृष्ठ फळ आले
तुझ्या जिद्दीला प्रणाम, तुझ्या वृत्तीला प्रणाम तुझ्या मानवतेवरच्या श्रद्धेला ही प्रणाम तवपूर्वी जरी बहु निपजले
असतीलही हया धरतीने 
तुझ्या कृतीतून तू निर्मियली 
त्या भारतीय घटनेला ही प्रणाम !!
कवि'रवि'

स्मृती वात

मनाच्या कोंदणातील तुझ्या आठवणींचा
तो नंदादीप उजळला मात्र 
आणि मग
गतस्मृतींची दिवाळीच झाली .....||१||
सुर्र सुर्र उडणाऱ्या
भुईनळातील बारूदी प्रमाणे 
सारे प्रसंग जीवंत होऊन
अंगावर उधळून आले! ...........||२||
कांही क्षण मन सैर भैर झालं
आणि पुन्हा
भुईनळा प्रमाणे शांत शांत झालं....||३||
वास्तवाची जाण 
बुद्धी इतकं कुणीच ठेवत नाही.
आणि म्हणूनच, संपावसं वाटलं तरी
संपता येत नाही.......................||४||
नंदादीपाची अखंड ज्योत
सतत तेवतच राहणार
निश्चलतेने
कुणी उजळो वा न उजळो
जळतच राहणार ..................||५||
स्मृती जरी गत असल्या तरी
वर्तमानाशी सतत निगडीतच असतात तोडावेसे वाटले तरी
रेशीम बंध घट्ट असतात 
रेशीमबंध घट्ट असतात...........||६||
कवि'रवि'

मेरी हस्ती और हालात

आंधी से कतराते हुए
पहुंचा जो किनारे के पास 
सामने सैलाब को पाया
और मायूस हो गया 
इरादों के साथ वास्ता तोड़कर
हश्र में ग़म को पाकर
गुमराही के आलम में
चाहने लगा किसी का साथ
तूफान भी बे गैरत हो कर 
चल पडे साहील की मोहब्बत में
रेत पर अश्क गिर पड़े तो
तेजी से रेत के हो लिये
जैसे दूसरे से छीन कर लाये हो
मेरी हस्ती तुझपे कुदरत क्यों है
इतनी बे मेहरबाँ 
जैसे तुम उसके ना चाहने पर भी 
धरती पर आये हो 
कवि'रवि'

ऐतमाद

दोस्त वही जिसकी नज़र नजरों से होकर दिल में उतर जाती है
नजरों के आइने पर दिल की कहानी उतार लाती है
मेरे चेहरे पे जो नज़र आती हैं
कहकहों की कतारें
वो जानता है कहां से उधार आती है
ना रोक! 
कहता है मुझे
उमड़ते वो आंसू
इस कश्मकश में उसे
मेरी नादानी नज़र आती है
कवि'रवि'

प्रतिक्षा

पलीकडच्या फलाटावर
अचानक चमकली 
ती तूच होतीस कां
धावत्या गर्दीतही 
स्पष्ट उमटली
ती तूच होतीस कां
दृष्टी वर आतां 
भरवसा उरला नाही
स्पंदनातून जाणवली 
ती तूच होतीस कां
फलारावरील खांबासारखा
स्तब्ध झालो मी
पुन्हा हुलकावून जाणारी 
ती तूच होतीस कां
पटणार नाही तुला पण कां कोण जाणे अजूनही वेड्यागत स्थिती आहे
पलीकडच्याच फलटावर तरी
पुन्हा एकदा येशील कां 
पुन्हा एकदां येशील कां
कवि 'रवि'

बज्मे इशरत

शाम जब ढल के 
रात में बसर करती है 
इशरतें मय 
रिंदों पे असर करती है
पैमाने पैमानों से टकराकर संभल जाते हैं
रिंदो की महफ़िल आसमानी सफर करती हैं बहकते हैं कदम लडखडाती है जुबाँ 
उस पर कुछ और भी असर 
साकी की नज़र करती है 
मैखाने पे उतर आता है पूरा शबाब़ 
ऐसे आलम पे जन्नत भी मेहेर करती है 
न वक्त की खबर न दुनियादारी का होश 
बस करती है सिर्फ शराब अमल करती है
कवि'रवि'

शून्य

जातोय मित्रा ?
होय, जायलाच हवं
 नियतीच्या इच्छेला अनुसरून जायलाच हवं
कुणी, कुठे, कसा, कधी 
अंतापासून अंतापर्यंतचीच सारी वाटचाल शून्यातून निर्माण होवून 
शून्यातच संपणारी सारी हालचाल आकृतिबंधाचे नियम सृष्टीस मान्य नसतात
रोज नवं घडते आहे, रोज जुनं मोडते आहे
कालच्या व्याख्या पुसून,
 नवे सिधांत जन्म घेतच आहेत. 
अविष्कारांचे डोलारे, पुन्हा राखरांगोळी 
सारं घडतेच आहे.
सगळीकडे अनिश्चित सर्व कही
 शाश्वत असं कांहीच नाही
थांबू कसा?
मी धांबू कसा ? सांग, मी थांबू कसा
मल जायलाच हवं, नियतीच्या नेमाने जायलाच हवं
हळवा होवू नकोस, दु:ख करू नकोस 
तू तरी कसा थांबू शकशील ? 
माझ्या आणि तुझ्या शून्यातील अंतर 
कदाचित अनभिज्ञ असेलही
तरी तुलाही शून्यातून बाहेर पडून
शून्याकडे जायलाच हवं.... जायलाच हवं
कवि'रवि'

सबक

गर्दिशें
जब मेहरबां हो के आयी है
तब अश्क़ बहाता क्यों हे
परछाई 
तुझसे दामन ही छुडा आयी है
आईना खुद को दिखाता क्यों है 
वक्त बेवक्त में
बदल जाये तो
फितरत पे भरोसा 
जताता क्यों है
रोशनी गरचे करें
तुझको बेनकाब
खुद को छुपाता क्यों है 
रंजो ग़म का
उमड़ आया हे सैलाब 
बे इंतेहा
आस को भगाता क्यों है
कवि'रवि'

गुज़ारिश

कोई परवाने से कह दें, 
खुद को जलाता क्यों है
शमा तो जलती है जलाने के लिये 
बागबां भी रहम फर्मा है
तुझको रिझाने के लिए
ये गुलिस्तां ये चमन हैं बहार पे
तेरे शिकवे तेरे ग़म को मिटाने के लिए
बाद समझाने के भी 
तुझको आया न इलम कोई 
तेरीरी हस्ती है खुदको लुटाने के लिये
परखाने खुद को जलाता क्यों है 
शमा तो जलती है जलाने के लिये
कवि'रवि'

बारूद

मेरे गीत घुंगरूओं के संग 
जब थिरकने लगते हैं
उलझे उलझे से कदम
वही रुकने लगते हैं
देखकर दोज़ख की
रूहानी महफ़िल
शेखो बरहमन भी 
चूकने लगते हैं
अल्फाज (जुबाँ) कुदरत का करिश्मा हैं
बेगुमान भी समझने लगते
तेरी अदाओं से रूबरू होकर 
ना फर्मान भी बहकने लगते हैं
पेश करता हूँ जब 
कोई इन्क़लाबी शेर
अच्छे अच्छों के दिल धड़कने लगते है
कवि'रवि'

ध्यास

जग हे वेड्यांचे भांडार 
जग हे वेडयांचे भांडार
कुणी वेडा स्वार्धा करिता कुणी वेडा ठार ||धृ 
वेड घेवुनी कुणी जगतसे 
ध्येय तयांना कांही नसे
कुणी हो वेडा ध्येय साधण्या 
मनीं त्याच्या अंगार ..............१
लोभास्वत होवोनी वेडा
जीव घेतसे कुणी कुणाचा
प्राक्तनी त्याच्या फाशी येता
रडतो मानुनी हार ................२
एक होतसे धर्माचा वेडा 
जागोजागी करी बखेडा
पेटवुनी गल्ल्या वस्त्यांना 
सुखे झोपतो पार ................३
जग हे वेड्यांचे भंडार 
कवि 'रवि'


मोहब्बत की मिसाल

ये कहानी है शमा और परवाने की
जिनकी फितरत है जलने जलाने की 
हर तरह रूप से दिखता हे पतंगा प्यारा 
और शमा तो जैसे धरती पे चमकता तारा दोनों में प्यार का जज़्बा है इस कदर 
दोनों जलते है बैखोफ मर जाने से बेखबर 
ना कोई मिसाल है नहीं कोई जवाब 
इनकी आशनाई का 
न गिला है न शिकवा न पता 
इनमें रुसवाईका, 
इक दुसरे से मिलकर दोनो 
आपस में यूं समां जाते हैं 
मोहब्बत में शहीद होकर
ये जन्नत जरूर जाते हैं 
चंद गिनने को मिलती है 
मोहब्बत में इन्सानी मिसालें
शमा और परवाने हजारों है बड़े दिल वाले कुदरत का तमाशा हो भी 
पर ये शहादत हे बहरहाल 
देखता हूँ जब भी ये नजारा 
मैं हो जाता हूँ बेहाल 
जीने का मकसद ही जिसने 
कुर्बानी बनाया होगा 
सुनहरे लफ्जों में वो 
अपना नाम लिखाकर आया होगा
कवि'रवि'

सारथ्य

मी आताशा एकटाच हिंडतोय 
होंडक्या, एकटया, रेल्वे इंजिना सारखा
इथून तिथे, अन्, तिथून इथे 
समक्ष येते हे दृष्य
 तेंव्हा
मनात कालवाकालव होते !! 
होंडके, एकटे इंजिन, 
कधी कुणाला आवडेल कां
खुद्द इंजिलाला तरी, 
हे असं धावणं साहवेल कां 
इंजिनाचा वसा निराळा
सतत भार पेलवून अपार धावण्याचा 
धावताना कधीही चाकोरी न सोडण्याचा 
मग ओझे नसल्यागत धावणं
इंजिन कसं सहन करील ?
तरिही धावतेय 
न अडखळता न थांबता 
नव्या आशा, नव्या दिशा, 
नवा भार अंगावर घेण्यासाठी
नव्या युगाच्या नव कल्पनांना मार्गस्थ
करण्यासाठी 
इंजिना ! चाकोरी सोडू नकोस
घेतला वसा टाकू नकोस
धावत रहा, मीही धावेन 
तुझ्या सारखा 
तुझ्या अंतरातील उर्मी घेवून 
तुझ्या जाणिवा अंगी बाणून
कवि'रवि'

प्रतिक्षा

आज, 
जरी असा निष्पर्ण झालोय मी 
बहरल्या फांद्यांवर, डेरेदार यष्टीवर
कधी
तू भाळली होतीस 
तुला वाटायचे 
मला काही कळतच नाही
आणि त्या धुंदल्या अवस्थेत
एकटक
तू मला न्याहाळत राहायचीस 
मीही कधी तुझा दृष्टीभ्रम मोडला नाही
आणि
स्तब्ध, निर्विकारपणे तुझ्या डोळ्यातील भाव टिपत राहायचो
तुला आनंद देण्यातच 
वाटायचे मला सुख 
पण का कुणास ठाऊक
 तू मला पुतळयागत मानले
मनसोक्त माझ्यासवे राहूनही 
तू अचानक परकी झालीस
माझ्या जखमांचे व्रण अजूनही पाझरताहेत मूक माझे सर्व अवयव अंतरी ओरडताहेत ह्या अशा वठलेल्या अवस्थेत 
तू पुन्हा समोर आलीस 
काष्वठत यष्टी मध्ये विजेची लहर दौडून गेली अजूनही 
त्याच स्थानी अगदी तसाच 
पण कांहीसा लवलेला मी 
तुझी प्रतीक्षा करतो आहे 
तुझी प्रतीक्षा करतो आहे
कवि'रवि'

मनाच्या प्रवृत्ती

रंगले हे विश्व, 
जर कां कधी मन रंगले
भंगल्या दाही दिशा, 
जर हे कधी मन भंगले 
मन मानवाची उर्मी स्कूर्ति
 मन चालना मनची गती
मन उच्च आदर्शास प्रसवे 
मनची ती फिरवी मती
मन ज्या क्षणी इच्छा बदलते 
वाल्मिकी जन्मास येतो
मन क्षुब्ध होते त्या क्षणी 
प्रस्थापितांचा ऱ्हास होतो
रे मना मजला कधी
मोहात तू पाडू नको
तृप्त या हृदयांत माझ्या 
मद मत्सरा धाडू नको
कवि'रवि'

सुकून

हर शब की शहर नयी होती है
आफताब की नजर नयी होती है 
रोशन होता है जहाँका हर मंजर 
मंजिल की खबर नयी होती है
नया दौर, हौसले भी नये होते है 
आरजुओं की फेहरिस्त अक्सर नयी होती है
दुआऐं, मन्नतें, इक्बालो मदद 
हर अदा की अदाऐं नयी होती है
ढलते शाम के आगोश में
पहुंचकर होता है हिसाब
दिल को समझाने की लज्ज़त नयी होती है
कर हवाले निंद के सोता है हर इन्सान
पुर सुकूँ इस ख्याल से 
हर शब की सहर नयी होती है
कवि'रवि'

प्रणय

कोकीळ गातोय आंब्याच्या बनात 
गुदकन हसू आलं तिच्या मनांत
वसंत आला आम्र बहरला
प्रेमाचा आलाप हृदयात भरला
भिरभिर नजर क्षणभर थांबली 
प्रणयाची पतंग दूरवर लांबली
इकडून तिकडे करी शतपावली 
लाजून चूर जरी दिसली सावली
वाटे कधी बोलू, पण, कशी काय बोलणार त्याने पुढे झाल्याविना नाहीच चालणार
प्रेम असं कसं वेडं पिसं बाई
घडीभर सुद्धा करमत नाही 
जीवाचा मैतर तरी अणजाणा
एकदाची भेटेन करून बहाणा
हिम्मत करुनी गेली माडीवरी
नेमून नेटकी साडी चोळी बरी
त्याने पाहिले तिला अन सावरता झाला 
म्हणे तूच आहेस की भास होतोय मला
तिची मान खाली कान आसुसले हावभावातून त्याला सारे समजले
क्षणातच तिने पाय काढता घेतला
 त्याच्यावरी आता मोठा प्रसंग बेतला
त्याने मग घातले आईला साकडे
सून म्हणून तू तिला स्विकार ना 'गडे' 
एक दिनी विवाहाचे वाजले चौधडे 
कोकीळ तो अजूनही गातोय पोवाडे
कोकीळ तो अजूनही गातोय पोवाडे
कवि 'रवि'

यती

शुष्क पर्णे वाजती
चरचरा चरचरा पायातळी 
उग्र रूप देखोनी ते
सर्द झाल्या कातळी 
घोर तप केला तयाने
सर्व जाणिती तो यती
त्यजुनि सर्वस्व अपुले
ध्वस्त केली नीयती
कंटकांची करुनी शय्या
निद्रिस्त तो होई असा
शयनगारातील मंचक
मऊ मुलायम तो जसा
स्थैर्य ना विश्रांती त्याला
 भटकतो रानांतरी
आस कैची ते कळेना
'सुप्त' त्याच्या अंतरी
कर्मयोगाच्या बळाने 
आदर्श जो निर्माण केला
आठवा प्रत्येक जनहो 
संदेश जो देवून गेला
कवि 'रवि'

आभार

आभाळातलं पाणी 
भूमिवरी आणी
उपकार कर्त्या वाऱ्या 
आम्ही तुझे ऋणी
आभाळातलं पाणी
जेव्हा झुळुझुळु वाहे
लहानगं पोर 
त्याला टुकुटुकु पाहे
आभाळातलं पाणी
जेव्हा शेल भिजविते
धरणीची माझ्या
तेंव्हा कुस उजविते
आभाळातलं पाणी
जेंव्हा पडे अंगावरी 
नवतीची उरी तेंव्हा येई शिरशिरी
आभाळातलं पाणी 
भरी तुडुंब पाटवे
वेड्या मना माझ्या 
नवं गाणं ही आठवे 
आभाळातलं पाणी
पड़ो ऋतु काल माने 
बळीराजा माझा 
जावो भऊन सुखाने
कवि'रवि'

पाऊस आणि चराचर

सुसाट  वारा
घोंगावत रानात शिरला
पाठोपाठ 
आकाशात काळा ढग दिसला
टप टप रट रट
थेंबांचा वर्षाव झाला 
पाने, फांद्या डोलवित
अवघा रान नाचला
मातीच्या गंधाने 
मुग्ध पशु पक्षी
आनंदे बागडल्या
तरु वल्लरी दाही दिशी
शुष्क कंठ धरणीचा 
जल प्राशुनी सुखावला
पाहुनी पावसाला
आसमंत विसावला
ये असा चौमास तू
भरुनी जल स्त्रोता सवे
धरती वरल्या जीवनाला
तुज पासुनी इतके हवे
कवि'रवि'

इन्सान

इस सुनहरे दश्त़ में
लबालब इश़रतें चारों तरफ
इस कदर फना है वक्त 
शब भी सहर सी गुमां होती है 
सुना था वस्ल में भी होती है तनहाईयाँ 
इन्साँ के दश्त़ भी विरान नजराते है
क्यों हो कोई रूबरू चाहे भी हो हमसफर हमदर्द यहाँ के लोग कहाँ होते हैं 
न सुने कोई चीख न पुकार 
न दिल की आवाज 
हर बात से टलने के बहाने होते हैं 
इक मैं खोजूँ मिले कोई हमनफस् 
जर्रे जर्रे में यहाँ खुदी के अफसाने होते हैं खुदगर्ज इन्सानों के शहर कहाँ आबाद 
दिल से मुफलिस, बेकद्र, बेहया होते हैं
कवि'रवि'

विलोभनीय

श्याम कुंतल, मोगरा शुभ्र वरी शोभितो
येतो सुगंध कोठुनी, भ्रमरापरी भी शोधितो रात्र चंदेरी तयातच प्रखर तूही चांदणी 
कांही समजेना मनाला 
कोणास हा मी शोधितो 
बघूनिया तव रूप सुंदर चंद्र ही बघ लाजला करुनिया तुलना मनातच, उत्तरा मी शोधतो उधळले सर्वस्व तुजवर सृजनकर्त्याने बरे. आणखी वर मोगराही हे कसे, मी शोधितो देखोनि तव मुख चंद्रमा 
शत सूर्य ही ते भाळले 
कां नसे तुजला तमा विस्मये भी शोधितो
कवि'रवि'

अपेक्षा

माणसातल्या माणसाला
कधीतरी जाग येईल

शुद्ध अंतःकरणे तो सृष्टीकर्त्याकडे  पाहील पाहील जेंव्हा, कळेल त्याला
त्याच्या मनातील आर्तता
सृष्टी नियंता तो जरी 
त्याची माणसापुढील असहायता 
कल्पनेच्या अत्युच्य समयी
तयाने
मानवाते निर्मिले
जे न द्यावे कोणासही
ते सर्व तुजला वाहिले
वाहुनी वर आणखी
वरदान ते दिधले असे 
साध्य तू करिशील ते
 जे तुला स्वप्नी दिसे
मानवाने आजवर
केला त्याचा भ्रमनिरास
केवढी परमोच्च परीची
होती तुझ्याप्रती त्याची आस
स्वार्थ मद उन्मत्तता 
व्यापात तू जव गुंतला
निर्मितांनाचा तुला
त्याचा विचारच भंगला 
हो आता चाणाक्ष तू 
कर प्रेम तथा धरतीवरी
एकदा का होईना, कर अपेक्षा तू पुरी
कवि'रवि'

नियंता आणि मी

घनदाट ज्याची साऊली
निष्पर्ण आज झाला
दिवसासवे जैसा 
तेजोमय सूर्यही निमाला 
गूढ अनंताचे कळेना
कां करी ही मस्करी
बनवुनी अद्‌भूत मूर्ति
कां असा लुडवी परी
नितनवे निर्माण करितो 
अन् पुन्हा करितो जुने
तेजात अंधारास भरितो 
वलयांकित पडिती उणे 
विविध अंगी, विविध रंगी
तु तसा आहे खरा
वागतो तू ज्या तऱ्हेने
हा छंद तुजला ना बरा
ही तुझी सृष्टी चिरंतन
तूच तो सर्वज्ञ स्वामी 
तरिहि तव हे वागणे 
समजण्या असमर्थ मी
कवि'रवि'

वर्षला हर्ष

पहिला पाऊस

या ऋतुत शुभ्र कळ्यांच्या रुपाने बरसला
चित्तवृत्ती
मोहरल्या
आसमंत बहरला
थरथरत्या पानांच्या अंगी 
सुखाव्याची ऊब आली
रणरण तापलेली धरित्री गार झाली
उन्मादल्या त्या क्षणी
बागडती राने वने
शुष्कल्या पुष्करणी 
गीत गाती ते जुने 
अनाकलनीय दृष्य ते
मोद भरुनी वाहतो 
पहिल्या वर्षेस मीही
अपूर्वाईने पाहतो
कवि'रवि'

अंदर की आग

बंधो, सस्नेह नमस्ते,
हरामी दिमाग से हरामीपन ही जन्म लेता है। गंधी जो दक्षिण अफ्रीका में लताड़ खाते हुए कुछ वर्ष निर्लज्जता से जीता रहा, उसे अचानक कहां से स्वाभिमान जागा? 
वास्तव में उसे गोरी चमड़ी वाले सूअरों ने चिन्हित कर उसके साथ एक कोन्ट्रैक्ट किया की वो भारत जाएगा और यहां की मूर्ख जनता को नंगा हो कर वश में कर लेगा। वो इतना जानते थे कि हम नंगों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं। नैरू और उसकी चांडाल चौकड़ी ने उसे ब्लैकमेल किया और हमारी शोषण की कहानी अथक चल रही है।

Friday, 11 June 2021

बेरुखी

एक बूंद जो छलक गई पैमाने से। 
साकी ने इशारा किया 
अब निकल जा मैखाने से। 
क्या बताऊं कितना गुस्सा आया, 
प्याला शराब का धो कर 
हमनें बस चाय से भर लिया। 
अब तो चाय ही चाय है 
अपने जीने का सहारा, 
न डालना ऐ साकी 
हम पे नज़र दोबारा।
कवि'रवि'

नाराज़गी

एक बूंद जो छलक गई पैमाने से। 
साकी ने इशारा किया अब निकल जा मैखाने से। 
क्या बताऊं कितना गुस्सा आया, 
प्याला शराब का धो कर 
हमनें बस चाय से भर लिया। 
अब तो चाय ही चाय है 
अपने जीने का सहारा, 
न डालना ऐ साकी हम पे नज़र दोबारा। 😀😀
कवि'रवि'

Thursday, 10 June 2021

राष्ट्र गीत

आओ प्यारे नन्हे मुन्नों
आओ बुढों और बुढ़ियों 
अरे जवानो और मस्तानो
हम सब मिलकर देश बनायें 
मिट्टी में होगी शुचिता
सह मानवता और नम्रता 
दया क्षमा और शांति इनका
अटूट सा गुण मेलन होगा
पानी केवल पानी होगा 
धरती केवल धरती होगी
एकही भाषा सब की होगी 
सहजीवन की आशा होगी
देश हमारा होगा धर्म
देश की सेवा होगा कर्म
प्राण देश और साँस भी देश
"राष्ट्रीयता" यही परिवेश
एक के आंसू सबके होंगे
एक की खुशियां सब की होगी
शील हमारा होगी संपदा
बल देखें तो भागे विपदा
लुटे गये हम चाहें जितना
टूट चुके हम जितना टूटना
एक देश हों एक जीव सा
यही कामना यही कामना
भारत माता की जय
वंदे मातरम्
कवि'रवि'

इरादा

बादल घिर आने दो
कड़कने दो बिजलियाँ
राहबर
तूफान से पा सुकून
लहरों को बना कश्ती
दरख्तों से कदम और आसमाँ सी बुलंदी
हर साँस में हो मस्ती
और इरादें चट्टान से
इन्तेहा है आना है तेरे करीब
बेख़ौफ ही आऊं तेरी चाहत भी तो है

इल्तज़ा

अब राह चलने को तैयार हूँ मै 
अब कोई काँटा चुभता नहीं
तकदीर तुझे ठुकरा चुका हूँ मै 
अब कोई चाहत लुभाती नही
मैं ही मैं दिखता हूँ मुझे हर सू 
किसी चीज में फर्क अब लगता नही
तेरे दर तक तो आया हूं हे ईश्वर
तेरे दीदार से भी मन अब लगता नहीं
बस यही है पुकार के दिला दे निजात
इसके सिवा कुछ और भाता नहीं
कवि'रवि'

अनुभव

उस दिन जब यह सोचा
क्या पहाड़ों की धड़कन होती है?
गूँजती हवा ने यह समझाया 
कि मुझमें भी जज़बात है
राह चलते पगडंडी पर 
कदम रखते जब सोचा 
पूछा क्यों हो इतनी टेढी और मुश्किल
जवाब पाया 
जिंदगी का तजुर्बा कराने के लिए
सुबह शबनम देख घास पर
अचानक खुश हुआ
उसने समझाया 
तकलिफों में भी चंद पल
होते हैं मेरी तरह
रात में कालीख से डरकर
जब दिया जलाने को मन हुआ
तो यह सुना 
खोज करो उसे उजाले की 
जो जीवन को ही रोशन कर दें
कवि'रवि'

जन्नत

ताजिन्दगी
जिनके दीदार को तरसे हम
आज मिले भी तो...... मेरे जनाजे पर
शुक्रगुजार हूँ ऐ राजे धड़कन 
मज़हार की मिट्टी तो.....सुहानी हो गयी
तुझसे न शिकवा कोई
न गिला न अफसोस
तड़पना मेरी हयात थी
ख़्वाब ही थी अबादत
जन्नते मैकश....मैकदा हो शायद 
मेरी जन्नत तेरे दीदार है साकी
कवि'रवि'

अंध:कार

रात की परछाई तले 
साँवला जिस्म लेकर
एक चमगादड़
मधुर धुन सोचकर 
गा रहा है बेसुरे गीत
उल्लू ने तान लेकर
जोड़ी है बंदीश कि साथ
आसमान में सितारे
मुरझाने को है 
अपने यौवन पर है
अमावस कि रात
तिनके का उड़ना भी
बनकर नगाड़ का आभास
छल रहा है 
मासूम शांतता को 
अपनेही  धुन में मगन
तेज कदमों से
चला जा रहा है अंधकार
सबसे सिमटा हुआ
अटूट अंग जैसा 
फिरभी अकेला, नि:संग
कवि'रवि'

गुढी पाडवा

आला पाडवा पाडवा 
मुखी बाणा हो गोडवा 
वर्ष प्रतिपदा आली 
मने आनंदाने न्हाली |
कर संकल्प प्रेमाचा 
प्रेमाचिया हो नेमाचा 
बंधुभाव जपण्याचा 
धरू हात गांजल्यांचा
करूनिया रुजवात 
राहू सुखात निवांत 
व्हावा शत्रुत्वाचा अंत 
हेचि द्या हो भगवंत
कवि'रवि'

अनसुलझे प्रश्न

नजरों के उस पार
कहते हैं
है और जीव सृष्टी
मेहमान बनकर 
क्या कोई गया भी है ?
विचारों की धारा
सतत प्रवाही है !
उगम की खोज 
किसीने की भी है ? 
अस्थियों का देह 
सभी संजोते हैं !
आत्मा की चाह 
कभी पूरी की भी है ? 
निर्मलता की अभिलाषा
 सभी को है
निर्मलता का पास निर्मलता से 
कभी किया भी है
कवि'रवि'

असमर्थता

उस पार 
एक शोला मुझे 
सितारे सा बना नजर आता है
इसपार की रोशनी
अब कुछ और धीमीसी ।
खटिया पर खाँसते उस बूढे की कराह 
किसी गर्त से उभरती सी |
साँसों का संघर्ष
साँसों के लिये ।
आत्मा 
तेरे भाग्य में केवल वेदनाऐं है
और शरीर 
तेरा प्राक्तन है त्याग |
उपभोग 
तेरी मृगया 
त्वचा के बाणों से
कुशल प्रयत्नों के बाद भी जीत तुम्हारी है
असमर्थ हाथ 
अब उठते हैं दुआ माँगने 
खटिया पर के बूढे को जीत कितनी प्यारी है।
कवि'रवि'

वर्तन

निसर्गे निर्मियले
निसर्गे फळविले 
निसर्गेचि ध्वंसिले
भौतिकासी

अश्वाचिये देहि
अश्व शक्ति जरी
कष्ट मुंगी परी
कोण करी

बळ वापरिता
प्रेम आचरावे
सौजन्ये प्रस्तावे
सर्वकाळ
कवि'रवि'

नश्वरता आणि स्वप्ने

अंधाराच्या गर्भात प्रयत्नांची काठी रोवून
वाट काढतोय........... वाटसरू
शत सहस्त्र वर्षांपासून 
अंधारच फाडतोय 
परास्त होतोय ...........वाटसरू
एक प्रकाशकिरण 
दिसल्या क्षणी धावतोय
मृगजळात फसतोय..... वाटसरू
कल्पनेचाच ध्यास
कल्पनेचीच भरारी 
कल्पनेतच क्षिरतोय .....वाटसरू
एका क्लान्त समयी 
वास्तवाची जाण व्हावी 
नश्वरता समजावी .......वाटसरूला
कवि'रवि'

चंद शेर

ये नाजनीन हुस्न, ये शोखियाँ ये जवानी 
तेरे जिस्म से लिपटते हुए
 रेशम भी सिहर उठता है 
तेरे जिस्म का रोआँ जो अहसानमंद है तेरा
मेरे पास आने से से सहम उठता है

तन्हाई की गर्त में खो चला हूँ 
अरमानों से आँचल धो धो चला हूॅं
मियांदे इशरत ख्वाब़ सी रही
मायूँसी के पर्बत ले चला हूॅं
कवि'रवि'

हिंदुओं से जागने और जगाने की विनती

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सहर और शबनम

शबनमी बूंदें सहर की किरणों में जब हीरों सी चमकती है, यकीन मानो दोस्तों मूझे बचपन की याद आती है। आज उम्र के इस पड़ाव पर चौथी मंजिल के घरनुमा कफ़स में कैद अधखुले दरीचे से जब मैं झांकता हूं दरीचे के उस पार, शाहजहां आगरे के क़िले से बाहर देखकर कैसा महसूस करता होगा इसका एहसास होता है। शुभ प्रभात की शुभकामनाएं देते हुए एक इल्तज़ा करता हूं कि भाइयों "सुबह जल्दी उठा करो"🤠🤠🤠🤠
कवि'रवि'

Tuesday, 8 June 2021

दिल और वो

हुस्न की उसके याद आयी 
तो धड़कन बढ़ती गयी
हूर जब सामने आयी 
धडकते धडकते रह गई
मुडकर चलने लगी तो
दिल कदमों पे जा गिरा 
घूमकर खड़ी हुई तो
दिल ने हंसने को नकारा
इस कश्म कश में के
मेरी जुबाँ से कुछ निकले
उसने पलकें उठाई
तो ज़ेहन जोरसे सिहरा
जब उसने देखा, 
यह कुछ कहने से रहा
तो मुझे आँखोंसे पुकारा 
दिल जो कदमों में था
हाथों में जा गिरा
जिस्म ने मेरे लेकीन वक्त पे मुझे मारा
जवाब न पानेपर जब, 
उठकर जाने लगी 
मेरी धडकन वापीस, 
मेरे साथ होने लगीं
दहलीज पर पहुंची तो
मेरी जुबां तेज हुई
क्या बताऊं बात सनसनीखेज हुई
न मैंने कुछ कहा ना उसने कुछ सुना
मन ही मन लेकिन
उसने मुझे ही चुना
आज हमारी मोहब्बत एक मिसाल है शाहजहाँ का जैसे कोई ताजमहल है
कवि'रवि'

विचार करा

जरा थांबा

धावत्या दुनियेला, कुणी अडवाल का हो
त्या पांगळ्याला कुणी हात द्याल का हो
जन्मतःच चंद्रावर
झेप घेणाऱ्या अपोलोला
अस्तीत्वाचा अर्थ सांगाल का हो
चॅलेंजर सारख्या
अर्भकांची भ्रूण हत्या
थांबवाल का हो
पृथ्वी वरील पाहुण्यांना रेडीएशनची मेजवानी
संपवाल का हो
अथपासून इति पर्यंत
पोचण्याच्या घाईत
सर्वस्व इति होतेय
हे बघाल का हो
व्यक्ति भेदा पोटी आता
ब्रम्हांडाची युद्ध भूमी घडवाल का हो ?
धावत्या दुनियेला कुणी अडवाल का हो....
कवि'रवि'

ज्ञान संज्ञा

निसर्गे निर्मिले
 निसर्गे फळविले 
निसर्गेची ध्वंसिले 
भौतिकासी
अश्वाचिये देहि 
अश्वशक्ती जरी
कष्ट मुंगी परी
कोण करी
बळ वापरितां
प्रेम आचरावे 
सौजन्ये प्रस्तावे 
सर्वकाळ
कवि'रवि'

प्रयत्नांची पराकाष्ठा

अंधाराच्या गर्भात
प्रयत्नांची काठी रोवून
वाट काढतोय वाटसरू
शत सहस्त्र वर्षांपासून
अंधारच फाडतोय
परास्त होतोय वाटसरू
एक प्रकाशकिरण
दिसल्या क्षणी धावतोय
मृगजळात फसतोय वाटसरू
कल्पनेचाच ध्यास
कल्पनेचीच भरारी
कल्पनेतच क्षिरतोय
वाटसरू
एका क्लान्त समयी
वास्तवाची जाण व्हावी 
नश्वरता समजावी वाटसरुला
कवि'रवि'

दो शेर

ये नाज़नीन हुस्न, ये शोखियाँ
ये जवानी
तेरे जिस्म़ से लिपटते हुए
 रेशम भी सिहर उठता है 
तेरे जिस्म का रोआँ
जो अहसानमंद है तेरा
मेरे पास आने से
सहम उठता है

तन्हाई की गर्त में खो चला हूं मैं
अरमानों से आँचल धो चला हूँ
मिंयादे इशरत ख्वाब सी रही 
मायूँसी के पर्वत ले चला हूँ
कवि'रवि'

राजकारण

प्रस्तावना करण्यासाठी
उघडलेल्या त्याच्या मुखातून
ओसंडत होती दांभिकता
श्रोत्यांच्या माना ही डोलत होत्या
दांभिकतेने
स्तुतीपर शब्दांचा ओघळ
लाळेसारखा
आणि सत्याला भुलविण्यासाठी
टाळ्यांचा कडकडाट
पुढाऱ्यांचा पुजारी आहे म्हणताना
चरकली होती त्याची जीभ एक क्षण
मनाचा कौल घेता घेता
आणि एक शीळक उठली होती शरीरात
पण
लांगूलचालनातून ध्येय प्राप्ती कडे जाण्याचा वसा घेतला होता त्याने इतिहासातून
न्यायपीठावर  बसवून प्रश्न विचारला असता त्याने समजाविले होते
राजकारण
कवि'रवि'

सौगात

बिजलियाँ
सहरां में
राही की सौगात लिये
चली आ रही है मेरे साथ
प्यास हलक तक
और चेहरे पे मुस्कान लिये
चला जा रहा हूँ मै
सहरां से सहरां तक
पहलू में रूह के सिवा
धडकन भी है 
अमानत मेरे पास
जज़बों की आग झुलस कर
कतरा कतरा बन चुका है ज़ेहन 
छालों ही के जूतों में पैर रखकर
चला जा रहा हूँ मै
मंजिल
तेरी आहट न होने दे मुझे कभी 
अबादत के आखरी पल तक 
चलना है मुझे
काइनात की शाईस्तगी को
बदलना है मुझे
तूफान की सॉंय सॉंय
कानों में गूंजती नहीं अब
पत्थरों से भूख मिटाये
चला जा रहा हूँ मै 
आगोश में धूप के 
अब गर्मी नहीं 
आफ़ताब को आँचल बना
चला जा रहा हूँ मैं 
सांसों तले रौंदी हुई 
मेरी शख्सियत 
जेहन के फफ़स से अब कोसो दूर
मुझे पुकारती हुई 
सितारों के गिर्द कहीं
खोज की चाहत लिये
चला जा रहा हूँ मै
अपने उद्देश्य की राह पर, 
लड़खड़ाता हुआ | 
बेरहम पैर 
मखमली दालन की चाह में
चलने से इन्कार कर चुके हैैं,
विचारों की प्रस्तर राह पर
'आदर्श' तेरी प्रतिभा से लिप्त
मै चला आ रहा हूँ, मेरी प्रतिक्षा कर
कवि'रवि'


एहसास

गेसूं बहक पड़े तो
महक तलब हुई
अपने लिये वाईज़
तब वो खाक थी
एक ख्वाहिश के लिये 
जिये नाकाम जिंदगी
मरने के वक्त भी
मुझे मरने की चाह थी
मुझे अबादत पे मेरी
था इतना प्यार
खाक में मिलने पर भी
 उजागर है मेरी मज़हार
अपनों को संजोनें में
सपनों की गिरायी लाश
हकीकत तो साफ थीं
फिर भी की खुद्दारी तलाश 
आज इस दश्त में तन्हा, 
पर तन्हा नहीं हूँ आज
औरों की वजह से कल था 
में मेरा ही हूँ आज
कवि'रवि'

आस

मंजिल मंजिल राहें राहें
भटकते कदमों के साथ
आशा निराशा के हाथ
बिकते बिकाते यहां तक
आरज़ू चली आई हैं
दर्या दर्या सागर सागर
टूटे चप्पू से ये हाथ
धकेलते जा रहें हैं
फूटी नैया को
भीतर मुसाफिर अंजान
नजरों से ओझल किनारा
चला जा रहा है वो
रात के अंधेरे में
साथ देते हुए चमगादड़
और सन्नाटा लेकर
मुसाफिर जा रहा है 
सुबह की आस लेकर
शहर की दिशा अंकित कर
होगी ज़रूर होगी
आगाज़ की इंतहा होगी
अहले सफ़र की सुहानी
एक मंजिल जरूर होगी
कवि'रवि'

शायरी

वो ऐसे मुस्कराये के गुलों पे खुमॉंर आया मुडकर यूँ देखा के गिरते को सॅंवार आया पलभर जो ठिठक जाओ जरा 
पाओगे मै जाँ निसार आया

सहरां के दिल पे बहार आयी है 
वो आये तो पतझड पे फुहार छायी है 
बादए लुत्फ का असर है यारों 
मेरी रूह तोडके मज़हार आयी है

बाद बादा के अब रहता न असर कोई 
साकी तेरे नजरोंकी सरजोशी कहाँ गई

एक जाम ही है
चुमों तो करार आता है 
उनकी बेरुखी पे अब
मुझे प्यार आता है
कवि'रवि'

तिनका

मचलते साहिल पे यूँ सफीना चला 
डोलते कंधो पे जैसे जनाजा चला 
मेरा दिल एक तिनका ही सही 
मंजील की आस में बेकरार चला
अश्क की दर बूंद के साथ 
तेरी सूरत छलकती देखी
टूटते सितारे की आह तक
तेरे ही खातिर देखी
बेवफा तेरे बेरहमी के आलम सें
पत्थर की धड़कन भी बंद होती देखी

आज अपने ही के हाथों निलाम हो गया बेफुर्सत फीरभी नाकाम हो गया 
तेरे कदमों के निशाँ ढूंढते-ढूंढते 
राहे अमल पे बेनिशाँ हो गया
कवि'रवि'

स्वतंत्रता?!

ओ मेरी स्वर्णमयी स्वतंत्रता,
तेरी स्वर्ण जयंती मना रहा हूँ ||१
घने काले बादलों के पार उस तरफ,
तेरे स्वर्णीम प्रकाश को देख रहा हूँ |
मेरा आज मेरे कल से बदतर सही
स्वतंत्रता से सांस ले रहा हूँ | 
चुन कर जिन्हें दिया मैने स्वतंत्रता से, 
वे लूट मचा रहे है, मैं देख रहा हूँ |
आभास और अस्तित्व दोनों के बीच.
कुचलता हुआ विश्वास देख रहा हूँ |
फीर भी खामोश, बेलाग, अनजान सा
बेझिझक और बेबाक जी रहा हूँ |
लेकीन मै चाहूँगा मेरी स्वतंत्रता,
तू जिये और चिरंतन जिये |
क्योंकि तुझे पाने के लिये
हजारो लाल तब मर के जिये |
उनके अरमानों का फल है तू 
कुर्बानी उनकी और निशाँ है तू |
कुर्बानी उनकी और निशाॅं है तू
उनके बोये इस बरगद को 
ये चूहे चाहे उतना कुलर डाले,
लेकीन में कुछ नहीं बिगाड़ सकते 
क्योंकि आज भी उसी खून का कतरा 
पल रहा है बनकर खतरा 
और उठेगा, जब वह उठेगा 
आँधी और तूफान बन कर
फिर एक बार घटित होगी क्रांति 
अपनों ही के विरुद्ध सत्य की खातिर
जो होगा संकेत सच्ची, सुहानी स्वर्णमयी स्वतंत्रता का ॥ 
मेरी स्वतंत्रता,तू जिये, जुग जुग जिये
कवि'रवि'

आग

तुझ्या अश्रूंची फुले 
माझ्या चितेवर पडली 
एक धगधगती आग अचानक शांत झाली । जगलो मी लेणे लेवून
पण डोळे नव्हते बघायला 
आज मरणांती दृष्टीची साकार पंढरी झाली | बोल लावू कुणाला
अंधत्व माझेच होते 
अल्पमतीची माझ्या जाणीव आज झाली |
 कवि'रवि'

गज़ले मैख्वार

पांव झूमने लगे जाम चलने लगे
आज महफ़िल में कोई खुमांर आ गया
आशिकी में तेरी गर न डुबते थे हम
माशुकी से तेरी गर न खिलते थे हम
मुझको दर्या समंदर न लेते करीब
कोई कहता था कुफ्रे शराब आ गया... पांव
ये न समझो रवि तो न अपना हुआ
तुम जहां भी रहो मैं रहूंगा वहां
ये न सोचो के हम-तुम मिले ही नहीं
मैं समझता हूं रुहों को प्यार हो गया... पांव
हुस्न की ताज़गी चंद घंटों की है
वक्त की दिलकशी इक नशा ही तो है
तेरी रूहे गरज़ गर पुकारे मुझे
लोग देखेंगे चलके मज्हार आ गया... पांव
मुझको अपना समझ ये खता तो नहीं
तेरी चाहत जहां को पता तो नहीं
तुम जहां से यूं परदा बरतती रहो
मैं तो तुम पर कभी जांनिसार हो गया... पांव
देख साकी मेरी एक दीवानगी
एक ये मैकशी एक आवारगी
कम से कम तूने मुझको बुलाया तो है
आज दिल की मैं तोडे दिवार आ गया... पांव
कवि'रवि'

जिंदगी

जिंदगी जिंदगी नाम है जिसका
एक खिलौना है शीशे का 
ढलते ढलते ही टूट जाये
करिश्मा है खुदाई का
जिंदगी जिंदगी नाम है जिसका 
इक झोंका है हवा का
आता है लहराता हुआ
जाता है तूफां की तरह 
 जिंदगी जिंदगी नाम है बूंदका
आसमां से गिरे या प्याले से छलके
बिखरते ही जाना है
अनगिनन दूकडो में
कवि'रवि'

मिलन

इक नजर का असर है ये 
के सागरो मीना मिल जाय
इक आह का असर है ये 
के दरो दीवार टूट जाय
इक मुस्कान से तुम्हारी 
छा जाती है बहार खिजाँ पे
इक लफ्जे उल्फत से तुम्हारी
मेरी हिकायत लूट जाय
चाहीये तुम्हे तो करो कुछ ऐसा 
मेरी रूह तेरे जिसम मे घुल जाय।
कवि'रवि'

मुहब्बत

बादलों की मुहब्बत है जमींसे 
                   आसमां से नहीं
नदिया की मुहब्बत है सागर से 
                    किनारों से नहीं
भँवरे की मुहब्बत है परागोंसे 
                   पंखुड़ियों से नहीं
मेरी मुहब्बत है तेरी रूहसे 
                   तेरे जिस्म़ तेरे रुक्सार से नहीं।
कवि'रवि'

असहाय

तन्हाई में अक्सर वह झुलसता रहता है,
टपकता हुआ खून बेरंग | 
यादों का मंथन और चरमराते हुए होंठ 
उत्सर्ग होती है असहायता | 
कलम की तलवार लिये 
लकीरों को काटता हुआ 
उडाये हुए छींटों जैसा 
एक कोरे कागज पर वो लिखता रहता है 
अपना अधूरा जीवन 
कठपुतलीयों के आगाह में बदसूरत सा उकसाने पर नाच नहीं सकता
पराजित फिरभी अविचल.... अविचल
कवि'रवि'

अहंकार

अहंकाराचा जनक 'तिरस्कार' आहे. जर कां एखाद्या व्यक्तीला समाजातील सर्व स्तरातून सतत अपमान, घृणा, तिरस्कार या गोष्टींचा सामना करावा लागला, मग तो गंमतीतून असो, चिडवण्यातून असो, टाळण्यातून असो किंवा ईर्ष्येतून असो. ज्यावेळी व्यक्ती अन्याय होत असल्याच्या भावनेने ग्रस्त होत जातो, त्यावेळी त्याच्या मनात अहंगंड निर्माण व्हायला लागतो. एक कारण आणखी आहे ते म्हणजे कुवतीपेक्षा जास्त मिळणे! आणि एकदा अहंगंडाने मनात घर केले की मरेपर्यंत त्यातून सुटका नाही.

मातृछाया

आई
चंदनाच्या सुवासाने दरवळणाऱ्या आसमंता प्रमाणे सुखमय तुझा सहवास. तुझ्या पदराच्या छायेत क्षणभर जरी विसावा मिळाला तरी असं वाटावं की रण रण तापलेल्या वाळवंटात वाट चुकलेल्या पांथस्थाला (मुसाफिराला) ओऍसिस मिळालंय. तुझा मायेने डोक्यावरुन फिरत असतानाचा हात म्हणजे जणू उघड्या पृथ्वीवर निराधार, निराश्रय जगणाऱ्या माणसाला मिळालेली आकाशाएवढी मायेची छायाच. सकाळची झोपेतून उठवितानाची हांक म्हणजे तर एखाद्या सुप्तावस्थेत असलेल्या माणसाला जागृत करण्या करिता प्रगट झालेली ईश्वरी शक्तीच. ती साद मला सांगून जातेय की बाळा उठ जागा हो आणि पृथ्वीवर घडत असलेल्या नित्य नवीन घटनांना डोळसपणाने बघ. त्यांचा 'खेळ' सदैव जागृत राहून अभ्यास कर, त्यांचा मागोवा घे आणि स्वसमृद्धीसाठी त्याचा उपयोग कर. एक क्षण जरी तू सुप्तावस्थेत व्यर्थ घालवलास तरी तो क्षण तुला मागे टाकून पुढे निघून जाईल. खरोखर अगाध अतर्क्य आहे तुझ्या कृतीतील मतितार्थ ! 
तुझ्या समीप असताना मात्र हा गोष्टीची किंमत कधीच कळू शकली नाही. त्यावेळी असं वाटायचं की तू उगाच त्रास घेतेय, पण आज कळतेय तुझ्या प्रत्येक कृतीमागील दूरदर्शितेची महत्वपूर्णता, कुंभाराने घडविलेल्या प्रत्येक घड्याला भाजून काढले की ते पुन्हा कधीच आपला आकार बदलत नाही पण तुझ्या हातून साचेबद्ध झालेला प्रत्येक मनुष्य, तावून सुलाखून निघालेला प्रत्येक पुत्र आपली विद्वता प्रगतीच्या मार्गाकडे पाहिजे तशी आणि पाहिजे त्यावेळी बदलू शकतो ह्यातच तुझ्या हातातील नैसर्गिक कौशल्य आणि अद्भुतता प्रत्ययास येते. तुझा विधाता तो ईश्वर असेलही पण माझा विधाता तूच आहेस. मला जन्म आणि जीवन दिलंय ते तू, शक्ती दिलीय ती तू.
बुद्धी आणि बुद्धीचा योग्य मार्गाने वापर करण्याची कला मिळालीय ती तुझ्याकडूनच आणि म्हणून सर्व दृष्टीने जडणघडण करून
साकारलेल्या या तुझ्या पुत्राकरीता विधाता रूपही तूच आहेस. कधी कधी तुझे ऐकले नाही म्हणून तू मारलेही असेल तरी आज त्याच अश्रुबिंदूंचे, हास्य आणि आनंदाच्या फवाऱ्यात रुपांतर होऊ शकलेय ते त्यावेळी तू दिलेल्या शिक्षेमुळेच! मी असे कधीच म्हणणार नाही की तुझे माझ्यावर अनंत उपकार आहेत उलट मी असे म्हणेन की तुला ज्याने ही जबाबदारी सोपवली होती त्याच्यावरच तुझे असंख्य उपकार आहेत. कारण तुझ्या करणीमुळेच त्या सृष्टी नियंत्याची सृष्टी, प्रगतीकडे मार्ग आक्रमीत आहे अन्यथा त्याच्या कर्तृत्वाचा संहार होण्यास क्षणकालाचाही समय लागणार नाही.
कवि'रवि'

सैनिकांचे मनोगत

तुझ्याचसाठी जन्म असे गं तुझ्याच वरती प्रिती
काय वर्णू मी मनातली ती तव विरहाची भीती
अष्ट योजने दूर असे ते माझे ध्येय ठिकाणे पाऊल पडते पुढे तरीही मन मागे साजणे
कर्तव्याप्रती बद्ध म्हणोनीजातो मी ह्या वेळा तुझ्या विना ती रात्र ही सुनी
कधी मिटेना डोळा कधी मिटेना डोळा
कवि'रवि'

शब्द स्तब्ध

शब्द माझे लेखणीला भावगाथा ऐकवीती
लेखणीतून भावना त्या शब्दरूपे उमटती 
त्या तिथे किंवा इथे ही 
कोण आहे सोबती 
सत्य जाणो नी तरीही कोण चिंता सोडती 
जीवनाच्या दोन तारा मोकळ्या टण्कारती
अन तरीही ऐकताना एकची त्या भासती
चार भिंती बांधल्या मीच माझ्या भोवती
विश्व हे कि ते कळेना कल्पना भांबावती
वास्तवाचे भान ठेवू की स्मरू स्वजनांप्रति ऐकुनी प्रश्नास माझ्या शब्दही पाणावती
शब्दही पाणावती
कवि'रवि'

आवाहन

हे ईश्वरा परमेश्वरा
सर्वोपरी सर्वेश्वरा

तू देव की........अल्लाह तू
आकाशिचा तो बाप की 
सृष्टीस ह्या निर्वाह तू

सर्वज्ञ तू सर्वस्व तू 
तुझिया कलांचा मर्मज्ञ तू
असतां अशी ख्याती तुझी 
तरिही कसा मग भांडवीशी

परमेश्वरा सर्वेश्वरा
ये एकदा धरती वरी
दे प्रेमची सर्वांपरी दे...... प्रेमची सर्वांपरी
कवि'रवि'

नामाचा महिमा

भजन

तुझे नाम कसे मी गाऊ
मज सांग कझा मी ध्यावू
जव भक्ताची में करुणा
तव भजनासी मे श्रवणा ॥ धृवपद।।

कधी काशी कधी मथुरा ती 
कधी पंढरी कधी शिरडीसी
कधी शेगांवी मज दिसशी
कधी गोकुळी क्रिंडा करिसी
तुज भेटण्या भक्तांठाई
कशी सांग असावी प्रीती ॥१॥


कधी गंगा कधी यमुना ती
कधी कृष्णा अन कावेरी 
स्नानादिक करुनी यांते
 मज वाटे शुद्ध मी कां रे 
प्रभु तू जर सर्व कणांसी
करी पावन सर्व जनांसी ॥21॥
कवि'रवि'

Monday, 7 June 2021

बाबा रामदेव और पीत पत्रकारिता

एक मराठी वृत्त पत्र में सुबह पढ़ने मिला " मोदीजी ने कल बाबा रामदेव को फटकार लगाई" इस विषय पर कि एलोपैथी चिकित्सा पर बाबाजी ने टिप्पणियां की थीं। मैं उस अधपके पत्रकार को बताना चाहता हूं कि बाबाजी ने एक भी वाक्य ऐसा नहीं कहा जिसे अन्यथा लिया जा सके। और रही बात मोदीजी की, तो उन्होंने उन नालायक जननेताओं को तथा विधर्मियों को फटकारा है जो वैक्सीन के विरुद्ध अनर्गल बकवास कर रहे थे और जनता में भ्रम फैला रहे थे। माध्यमों को चाहिए वे आइने के सामने खडे रहे, पीछे खड़े रहने पर कुछ नहीं है

मोदीजी धन्यवाद

भारत सरकार के तथा सभी सनातनी जनों के हृदयस्थ आदरणीय भाई नरेंद्र मोदी जी को आज फिर से प्रखरता से प्रकट होता देखा और आश्वस्त हुआ हूं कि हां हमें नरेंद्र मोदी नाम का प्रकाश दीप अतुल्य उजाला देता रहेगा। 
भाईयों, सभी देशवासियों को कोरोनावायरस का टीका मुफ़्त दिया जाएगा। अब चौकन्ना रहना होगा कि वैक्सीन व्यर्थ ना गंवाया जाए। 
मोदी हैं तो मुमकिन है। मोदी हैं तो विश्वास है। मोदी हैं तो आस है। मोदी हैं तो हमें जिम्मेदारी से उनका साथ देना है।

कोळिणीची 'व्यथा'

सांजवेळी मन होई कातर कातर
मावळला दिस कसा येईना भ्रतार
उधाणला दर्या वारा उधळूनी वाहे
नवतीची नार वाट एकटक पाहे
सिंह माझा वर मोठा हिंमतीचा थोर
येईल क्षणात मना लावू नको घोर
 त्याच्या सवे माझा जीव असा की गुंतला कोळ्याच्या जाळ्यात जसा मासा की गुंतला सुखरूप तया "देवा" येऊ दे घरासी
नवस बोलते येऊ तुझ्या दर्शनासी
कवि'रवि'

क्रांति

होय आता घ्या मशाली

तुम्हीच से स्फुल्लींग व्हा

गत सदीतील सुप्त ते

उत्स्फूर्त तुम्ही बिंग व्हा

कालची किंवा उद्याची

जयांसी नाही तमा

त्या अधमांना कराया

नष्ट तुम्ही शस्त्र व्हा

घोट घेती हे सदोदित

मायभूच्या रुधिराचा

मिटविण्या तयांची सद्दी

तरुणांनो तुम्ही सज्ज व्हा

ही नसे मम प्रार्थना किंवा नसे ही याचनाही टिकविण्या अस्तित्व तुमचे स्वावलंबी मर्द व्हा
कवि 'रवि'

शंभू स्तुती

भजन

चाल :- लेके पहला पहला प्यार भरके आँखों मे खुंमार

शंभो-शंभो भोलेनाथ देवा..शंभो भोलेनाथ करिसी कृपा मजवरी तू देवा शंभो भालेनाथ ||धृ||

कैलासावरी मुझी हो वसती
 गणेश कार्तिक आणि पार्वती

हिमशिखरे ही अती शोभती

करण्या भवसागर हा पार
 देवा मस्तकी ठेवशी माझ्या
तव मायेचा हात ||१||
कवि'रवि'

गणेश वंदना

वंदन करुनी तुज गणराया करितो कार्यारंभ | सदैव राहो माझ्या ओठी नाम तुझे हेरंब ॥

दीप द्वारी मांडिला. उजळला आसमंत

दीप पर्वाचे स्वागत करुया होवूनी 'आस' मंत सुख समृद्धी सदैव माँगे सदा असा श्री मंत

'ऐश्वर्या'चा तुमच्या वरचा कधी न होवो अंत

दीप प्रकाश.... उजळी आकाश

अंतर्रामी उजळू धरुनी ज्ञानाची कास
कवि'रवि'

भजन


चाल :- जिया बेकरार हैं

घेतो तुझे नांव रे.

देवा मला पाव रे

शरण मी आलो तुजला

आता तरी धाव वे ॥ धृवपद।।

काशी झाली मथुरा झाली

झाली चारही धामे हो... २

पावन व्हावा जन्म हा माझा

केवळ तुझिया नामे ॥ १॥

गंगा यमुना गोदा क्रिष्णा 
झाली सारी स्नाने हो....२

मन माझे पण शुद्ध पावते

तुझिया पद स्पर्शाने ||२||

जप तप करुनी पुष्य पावलो
 केली अनंत दाने हो....२

चिरशांति परि मजसि मिळाली

तुझिया दर्शनाने ||३||
कवि'रवि'

Sunday, 6 June 2021

तीन एहसास

जिंदगी
एक चलना, हिलना, डोलना
और खत्म हो जाना
कुदरत की नेमत के मुताबिक

जज़्बात
एक ऐसी चीज जिसे
हरदम सम्हालनेकी कोशिश करना, 
तलवे के ऊपर के घाव की तरह
और वह उतनेही टूटते चले जाना 
प्याले से गिरते हुए एक एक बूंद की तरह

इश्क़
एक दाग़ जिसे हरदम छुपानेकी
कोशिश करना, कॅंवल में छुपे भँवर की तरह और उसका दुनियाको उतना ही एहसास होना 
शामुरग के नाभी में बसी मुश्क की
खूशबू की तरह
कवि'रवि'

भजन श्री विठ्ठलाचे

परम सदगुरु नाम ऐकुनी
भक्तीमय झालो
विठ्ठला तुजपाशी आलो ||धृवपद||

दीन दुबळ्यांचा तू कैवारी
पापियांसही तू भयहारी
भयभीत झालो आज म्हणोनी
तुजपाशी आलो | विठ्ठला ॥१।।

तुझिया चरणीं विश्व नाचते 
तुझ्या दर्शने दुःख हासते
चैन पडेना आज म्हणोनी 
तुजपाशी आलो | विठ्ठला ||२||
कवि'रवि'

चढता सूरज


(आज जवानी पर इतराने वाले कल पछताएगा
इस कव्वाली में चार लाइनें जोड़ने का प्रयास)

जिंदगी मुसाफीर है
मौत उसकी मंजील ई
कश्ती किसकी माँझी कौन
कुछ न तुझको हासील है
वक्त के शिकंजे में
इस कदर बँधा है
दिखती राह ठुकराकर बन चुका है अंधा तू
ये समां जवानी का
खत्म हो ही जायेगा
देखता रहेगा तू
वक्त ढल ही जायेगा
गर्द से ही उठनेवाले
गर्द बनके जायेगा
चढता सूरज घिरे घिरे
ढलता है ढल जायेगा
कवि'रवि'

ख़याल

मेरे गुलशन में गुलों का बसेरा नहीं
गुलाबों की खुशबू नहीं, भंवर का गुंजन नहीं 
एहसास है पतझड़ का, पास है तन्हाई का


तेरी उल्फल नहीं तो क्या,
रुसवाई तो मेरे साथ हैं
तेरा दामन नहीं तो क्या
बेवफ़ाई तो मेरे साथ है, 
तन्हां नहीं था मैं कभी
मेरी परछाई मेरे साथ थी
निकले हुये जनाजे के साथ 
आज तन्हाई मेरे साथ है ।
कवि'रवि'

आलम

इश्क़ जब हमनें किया है तो
तुम्हे क्या वाईज़
तुमने अश्कों को तो पलको में छिपा रखा है।
मेरी महफ़िल से खफ़ा है
वो ज़माने के शरीफ
जिनको रिंदाना भी क्या चीज है मालूम नहीं
क्या हुआ हमने कहा चांदनी में बैठेंगे
चाँद की ज़ुस्तज़ू तो हमने कभी की ही नहीं ।
वो जो ज़िंदा है जिये जाते हैं झुलसाई में
उनको बर्बाद किया उनकी तलबगोई ने।
अबके इतनाही कहे तुमसे सितमगर मेरे
हमको भी लूट लिया है तेरी रुसवाईने ।
कवि'रवि'

याद

सुबह न आई,शाम न आई
एक पल ऐसा नहीं। 
जो उनकी याद न आई
रात न आई, दिन न आया
कोई समां ऐसा नहीं
उनकी यादों का एहसास नही लाया।
सुबह की सर्द हवा 
उनके यादों की नमीं लायी
शाम के उमडते बादल
उनके आगोश की कमी लाये । 
दोपहर की धूपसा
चमकता उनका चेहरा
याद आया खयालों में 
पेशे नजर नही आया ।
कवि'रवि'

बेकरारी

क्यों कहे हम के जिया जाय जहाँ की खातिर हम तो जिंदा है निगाहों की हया की खातिर

मौसमे गुल तो सदा अपने बख़त के है ही ख्वाहिशे दिल है सिर्फ अब तो कली की खातिर

यूँ तो बरसात सदा होती है बरसातों में 
बेकरारी है मेरी मेहताब की खातिर

पास तो है मुझे कलिजांए शीजा का 
चाहता हूँ के मजा कुछ तो हो तन्हाईका

बेकरारी का सबब कुछ भी नही कहनेको 
एक आवाज तहे दिल से उभर आती है
कवि'रवि'

असर

किसी नाजनीना के रुख़सार पे 
कभी देखा था कैफे इशरत हमने
आज मेहताब भी है धुंधलायासा 
मेरी निगाहों के सामने |
किसी निखरती हुआ बहार पे
 देखी थी शबनम की चमक हमने 
आज फिजाँ भी है कुछ मुरझाईसी
मेरी निगाहों के सामने। 
किसी लमहे की तर्ज भी
तरन्नुम थी कभी मेरे लिये 
आज तो अफ़साने भी है
मरसिये से मेरी निगाहों में
बदला नहीं हूँ मै न ही
बदली है मेरी निगाहें
कुछ असरदार कर दिया है समां
तेरी बेवफ़ाई ने ।
कवि 'रवि'

तमन्ना

हम तो डुबे हुआ है 
अपने ही अश्कों में
हमें देखकर आपने क्यों
अपना मूंह छिपा लिया । 
ग़म तो हमने खरीदा है
अपना दिल बेचकर 
आप क्यों ग़मगीन हो
इस तरह हमें देखकर 
हम तो मर जायेंगे
बेवफ़ाई का क़फन ओढ़े
 तुम मुस्कराती रहो सदा
मेरी मज़हार देखकर।
कवि 'रवि'

ख्वाहिश

मेरे गरेबाँ से खेले
मेरे अरमानों से खेले
मेरे जजबातों से खेले
तो भी कम हुआ।
मेरे दिल से खेले
मेरी वफाओं से खेले 
मेरी उल्फत से खेले
तो भी कम हुआ।
मेरी कब्र पर नाचो
मुझे बेनिशाँ बनाओं
मेरी अबादत को मिटाओ 
तो ही में समझूंगा
मेरी आशक़ीसे
मेरी आरजूओं से
मेरी हर बात से तुमको 
वाकई नफ़रत है।
कवि 'रवि'

बेगैरत

मैंने हर इक शक्स को 
तराजू मे तौलते देखा है
मैंने हर इक चीज को 
दामों पे बिकते देखा है
फिरभी समझ न पाया मैं
यूँही कभी मेरी उल्फत भी
दांव पर लग सकती है
मुहब्बत के मोल बराबर
नफ़रत ही मिल सकती है
कवि 'रवि'

गुमशुदगी

अपने आवाज की तर्जपोशी में समंदर गुम है
अपने रफ्तार की गर्मजोशी में
तूफां गुम है 
अपने बहारों की हुस्नपरस्ती में
गुलिस्ताँ गुम है
अपने चेहरे की मासूमियत में
मेरा महबूब गुमहै 
दिल में उभरती हुआ दरार में
मेरी आशकीयत गुम है।
कवि 'रवि'

हव्यास

कधी वाटतं खूप लिहावं
तावातावाने पेनही येतं हातात
टोपण उघडून श्रीगणेशा करणार
इतक्यात कानावर पडतात तीन शब्द
'अहो ऐकलंत का'
पेनाचं उघडू आलेलं टोपण लगबगीने बंद होतं
आणि मी उद्गारतो ' हो हो हा इथेच आहे ना'
प्रेयसीला दुखावणं किती हदयद्रावक असतं हे त्या पेनाला आणि वहीलाच कळतं.
शब्दघोट गळ्यात अडखळतात
पण मी तत्परतेनं आवाजाकडे जातो. 
स्वयंपाकाला काय करू?
काव्याच्या नादात विश्वाला गवसणी घालू पाहणारं माझं चित्त धाडकन आदळतं गॅसच्या ओट्यावर, पण तो वेढा सुटलेला नसतो.
नकळतच माझं उत्तर जातं 'खिचडी करून टाक'
झणझणीत उत्तर ऐकायला मिळेल ह्या अपेक्षेने बघणारी घरधनीण मिळमिळीत चेहरा करून एक वक्रदृष्टी टाकते अन् समजून जाते 'ह्याचं ध्यान कुठे और ठिकाणी लागलं आहे' 
कांहीं न बोलता ती अंतर्धान झाल्यासारखी निघून जाते समोरून, मी मात्र सुन्न होऊन कधी कागदाकडे तर कधी पेनाकडे बघत असतो असहायतेने. वहीशी प्रणय करायला आसुसलेलं इवलसं ते पेन अधाशासारखं बघत असतं माझ्याकडे, माझ्या निर्विकारपणाकडे!
कांहीं लिहिणं सुचणार नाही हे कळत असतानाही मी मात्र पेनाचं टोपण उघडतो आणि काही शब्द वहीवर उमटवतो. मनातला मी त्यावेळी दुःख विसरून अचानक सुखावतो कारण मी वही आणि पेनाचं पुनर्मिलन घडवून आणलेलं असतं.
विचारांच्या गर्तेतून उभारी घेतलेला माझा फिनिक्स पक्षी पुन्हा भरारी घेतो कल्पनेच्या उंच नभात आणि नकळत का होईना पुन्हा कविता स्फुरत जाते..... पुन्हा कविता स्फुरत जाते.
कवि'रवि'

पहिला पाऊस नवतीचा

पयल्या पावसाची बातच न्यारी
धिंगाना घालतंय पन वाटतंय भारी
ढगांचा गडगडाट,विजेचा कडकडाट
वाऱ्याची सांय सांय अन झाडांची सळसळ
असं काही संगीत की धडकी भरवतं
भल्याभल्यांची बघा मस्ती जिरवतं
पहिल्या पावसाची बातच न्यारी
धिंगाना घालतंय पन वाटतंय भारी
चिमण्या पाखरं मातर बेघर हुतात
माह्या भावना तवा लय कातर हुतात
शेतातला दाना जणू मातीचाच व्हता
मातीमोल घाम, आसवाले पार नोता
पयता भुई थोडी जवा कास्तकाराले व्हते
मावं मन देवा तुया पायाशी येते
नको रागू भरू असा, आमी तुहीच लेकुरे
तुह्या वाचून देवा आमचं पोट कसं भरे
पयला पाऊस पायतानी जरी मन हरिकते
दीनवानी दशा कशी कानू मले ना पाहावते
पडो पयला पाऊस जोमानं जरासा
धरती वरच्या जीवायले देवून दिलासा
कवि'रवि'

स्वातंत्र्यवीर सावरकर

 महर्षि वाल्मीकि, महाकवि कालिदास, संत तुलसीदास तथा संत तुकाराम जैसे महान कवि विभूतियों से जिनका कवित्व लेशमात्र भी कम नहीं, जिनकी काव्य पंक्तियां साक्षात सरस्वती का आशिष एवं वरदान प्राप्त कर पृष्ठ पर अंकित हुई है, ऐसे राष्ट्र भक्ति में नखशिख डूबे हुए महान तपस्वी कवि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी को जन्म जयंती पर कोटि कोटि प्रणाम! 

कवि'रवि'

Saturday, 5 June 2021

No way otherwise

 If @George_sores is trying to influence Bharatiya Janata by his tricks and tracks, he must firmly mind it very well that this is not a part of that world which still find entertainment in virtual reality. We as #sanatani become un defeatable when it matters with our #dharma . 

The fear is he will loose his penny and penny but won't succeed. 

So don't ever try to sell your bad with very few defected, rather join hands with us to prosper further more. Be Hindu and enjoy eternal peace. That's it!