मी जरी जगलो
मी जरी जगलो
मी जरी जगलो
शाम ढलती है
अप्रकाशित पृष्ठ मी
माझ्या व्यथा सांगू कुणा
शब्द अंधारात विरले
प्रस्तावना मागू कुणा
लेखणीतून रक्त उतरे
अक्षरे बंबाळली
मथळा लिहिण्यात माझे
हात ही रक्ताळले
ही कथा आहे तमाची
दृष्ये ही अंधारलेली
वाणी वैखरी नि:शब्द तरीही
गोष्ट ही साकारली
अल्प असती सौख्य अनुभव
म्हणुनी ते झुरती बघा
कल्पनेच्या कोंदणी
बघतात त्या उघड्या नभा
मी असा का रात्रवेडा
हाच वेडा प्रश्न आहे
माझिया नशिबी तमाचे
अतर्क्य ते साम्राज्य आहे
कवि 'रवि'
घर के एक कोने में पड़ी वो किताबों वाली रैक पर अनायास ही नज़र पड़ी और धक् से मेरा दिल ४० वर्ष पुरानी यादों में पहुंचा। क्या क्या और कितना बयान करूं, वो उम्र का तकाजा था, वो कालेजियन मंज़र, वो मस्तियां, वो अखबारों की सुर्खियां, वो युवा मंचों से उठने वाली जोश भरी दहाडें। रोमांचित करने वाली वो शाम के कट्टे पर की मुलाकातें, हर दिन हर पल जैसा हाथ से फिसल न जाएं इसकी चिंता। राजनीति में होने वाली उथल-पुथल मन मस्तिष्क को झकझोर देती थी। कभी लगता था कूद पड़ूं उस यज्ञ में, अपने अंदर के लाव्हा को बहने दूं बेतरतीब। लेकिन, तभी हमारे सिनियर्स की वो तजुर्बे वाली बात की 'ठहरो'! पहले अपनी शिक्षा पूरी करो, इस देश को अनाड़ी नहीं सुशिक्षित युवा चाहिए, अपने अंदर के लाव्हा को मुहाने पर ही रोकने में सक्षम हुआ करती थी।
खुशियों के चार पल
कुछ भी नहीं बचा है,
आखरी लम्हों में इकबार जी लूँ
तेरे शहर की हवा
इक दूसरे की खुशी और ग़म में
कां असाव्या भिंती, जर हे विश्वची माझे घर"। धर्म तरी कां अनेक, जर हे एकची अपुले घर।
आयुष्याची वाट लागली
शब्द माझे धाव घेतात
शब्द हे संहारक अस्त्र
ती म्हणाली त्याला
शब्दांच्या लाटांवर होऊनी स्वार
खुले दरीचे से
नव नयनांची शस्त्रे
छेडीत तार असतां
मेरी परछाई मेरा साथ दे
निः शब्द कां मन आज हे
लबों पर उभरते से वो लफ्ज़
कुणा काय द्यावे, मला ते कळेना
ख्वाबों में आते रहना
गर मुझमें हो अरमाँ
वाटेवरचा आंधळा,
माझिया हृदयातुनी गं
अबके जब हम
शाम जब ढल़ के रात होती है
मौत
कल्पना तुझिया मनातील
कुणी कधी अन कसे कुणास्तव,
येथे माणसे फक्त चेहरे होतात.
असाच कधीतरी विचारांमागे
कहाँ तेरा जवाँ हुस्न ये नादाँ
काळ, काम आणि वेग
शिकवे गिले किससे करें....
आकाशातील ताऱ्यांनो
शहर की गलियाँ
उत्तुंग है हिमालय सुखदायी सारी नदियाँ।
युग प्रवर्तका तुला शत शत प्रणाम
मनाच्या कोंदणातील तुझ्या आठवणींचा
आंधी से कतराते हुए
दोस्त वही जिसकी नज़र नजरों से होकर दिल में उतर जाती है
पलीकडच्या फलाटावर
शाम जब ढल के
जातोय मित्रा ?
कोई परवाने से कह दें,
मेरे गीत घुंगरूओं के संग
जग हे वेड्यांचे भांडार
ये कहानी है शमा और परवाने की
मी आताशा एकटाच हिंडतोय
आज,
रंगले हे विश्व,
हर शब की शहर नयी होती है
कोकीळ गातोय आंब्याच्या बनात
शुष्क पर्णे वाजती
आभाळातलं पाणी
सुसाट वारा
इस सुनहरे दश्त़ में
श्याम कुंतल, मोगरा शुभ्र वरी शोभितो
माणसातल्या माणसाला
घनदाट ज्याची साऊली
पहिला पाऊस
एक बूंद जो छलक गई पैमाने से।
एक बूंद जो छलक गई पैमाने से।
आओ प्यारे नन्हे मुन्नों
बादल घिर आने दो
अब राह चलने को तैयार हूँ मै
उस दिन जब यह सोचा
ताजिन्दगी
रात की परछाई तले
आला पाडवा पाडवा
नजरों के उस पार
उस पार
निसर्गे निर्मियले
अंधाराच्या गर्भात प्रयत्नांची काठी रोवून
ये नाजनीन हुस्न, ये शोखियाँ ये जवानी
शबनमी बूंदें सहर की किरणों में जब हीरों सी चमकती है, यकीन मानो दोस्तों मूझे बचपन की याद आती है। आज उम्र के इस पड़ाव पर चौथी मंजिल के घरनुमा कफ़स में कैद अधखुले दरीचे से जब मैं झांकता हूं दरीचे के उस पार, शाहजहां आगरे के क़िले से बाहर देखकर कैसा महसूस करता होगा इसका एहसास होता है। शुभ प्रभात की शुभकामनाएं देते हुए एक इल्तज़ा करता हूं कि भाइयों "सुबह जल्दी उठा करो"🤠🤠🤠🤠
हुस्न की उसके याद आयी
जरा थांबा
निसर्गे निर्मिले
अंधाराच्या गर्भात
ये नाज़नीन हुस्न, ये शोखियाँ
बिजलियाँ
गेसूं बहक पड़े तो
मंजिल मंजिल राहें राहें
वो ऐसे मुस्कराये के गुलों पे खुमॉंर आया मुडकर यूँ देखा के गिरते को सॅंवार आया पलभर जो ठिठक जाओ जरा
मचलते साहिल पे यूँ सफीना चला
ओ मेरी स्वर्णमयी स्वतंत्रता,
तुझ्या अश्रूंची फुले
पांव झूमने लगे जाम चलने लगे
जिंदगी जिंदगी नाम है जिसका
इक नजर का असर है ये
बादलों की मुहब्बत है जमींसे
तन्हाई में अक्सर वह झुलसता रहता है,
अहंकाराचा जनक 'तिरस्कार' आहे. जर कां एखाद्या व्यक्तीला समाजातील सर्व स्तरातून सतत अपमान, घृणा, तिरस्कार या गोष्टींचा सामना करावा लागला, मग तो गंमतीतून असो, चिडवण्यातून असो, टाळण्यातून असो किंवा ईर्ष्येतून असो. ज्यावेळी व्यक्ती अन्याय होत असल्याच्या भावनेने ग्रस्त होत जातो, त्यावेळी त्याच्या मनात अहंगंड निर्माण व्हायला लागतो. एक कारण आणखी आहे ते म्हणजे कुवतीपेक्षा जास्त मिळणे! आणि एकदा अहंगंडाने मनात घर केले की मरेपर्यंत त्यातून सुटका नाही.
आई
तुझ्याचसाठी जन्म असे गं तुझ्याच वरती प्रिती
शब्द माझे लेखणीला भावगाथा ऐकवीती
हे ईश्वरा परमेश्वरा
भजन
भारत सरकार के तथा सभी सनातनी जनों के हृदयस्थ आदरणीय भाई नरेंद्र मोदी जी को आज फिर से प्रखरता से प्रकट होता देखा और आश्वस्त हुआ हूं कि हां हमें नरेंद्र मोदी नाम का प्रकाश दीप अतुल्य उजाला देता रहेगा।
सांजवेळी मन होई कातर कातर
होय आता घ्या मशाली
भजन
वंदन करुनी तुज गणराया करितो कार्यारंभ | सदैव राहो माझ्या ओठी नाम तुझे हेरंब ॥
जिंदगी
परम सदगुरु नाम ऐकुनी
मेरे गुलशन में गुलों का बसेरा नहीं
इश्क़ जब हमनें किया है तो
सुबह न आई,शाम न आई
क्यों कहे हम के जिया जाय जहाँ की खातिर हम तो जिंदा है निगाहों की हया की खातिर
किसी नाजनीना के रुख़सार पे
हम तो डुबे हुआ है
मेरे गरेबाँ से खेले
मैंने हर इक शक्स को
अपने आवाज की तर्जपोशी में समंदर गुम है
कधी वाटतं खूप लिहावं
पयल्या पावसाची बातच न्यारी
महर्षि वाल्मीकि, महाकवि कालिदास, संत तुलसीदास तथा संत तुकाराम जैसे महान कवि विभूतियों से जिनका कवित्व लेशमात्र भी कम नहीं, जिनकी काव्य पंक्तियां साक्षात सरस्वती का आशिष एवं वरदान प्राप्त कर पृष्ठ पर अंकित हुई है, ऐसे राष्ट्र भक्ति में नखशिख डूबे हुए महान तपस्वी कवि स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर जी को जन्म जयंती पर कोटि कोटि प्रणाम!
कवि'रवि'
If @George_sores is trying to influence Bharatiya Janata by his tricks and tracks, he must firmly mind it very well that this is not a part of that world which still find entertainment in virtual reality. We as #sanatani become un defeatable when it matters with our #dharma .
The fear is he will loose his penny and penny but won't succeed.
So don't ever try to sell your bad with very few defected, rather join hands with us to prosper further more. Be Hindu and enjoy eternal peace. That's it!